Wednesday, January 8, 2014

तीसरी दोस्त, रानी (बर्र) से मुलाक़ात

टुकटुक ने तो मेरी सारी परेशानी लगता था हर ली थी! नाना जी के घर से जाने के एक दिन पूर्व मैं लगभग सारा समय टुकटुक के साथ ही था. इस बीच टर्रटर्र भी हमारे साथ ही था. मैं अस्तबल में खड़ा टुकटुक की गर्दन सहला रहा था. अचानक मैंने देखा टुकटुक के लिए घास का बंडल लिए झपसट आ रहा है. मैंने जल्दी से टर्रटर्र को अपनी कमीज की जेब में रख लिया. झपसट आया और बिलकुल मेरे बगल में खड़ा होकर टुकटुक के आगे चारा डालने लगा. उसकी हरकतों से लगा कि वो मुझे नहीं देख पा रहा. फिर भी पक्का करने के लिए मैने उसके सर पर पीछे टीप मारी. उसने पलट कर देखा, और अपने आप से बोला, ‘ना जाने कौन था!’ मैंने एक टीप और मारी तो इधर-उधर देखते हुए जरा जोर से बोला, ‘कौन है यहाँ?’ पर उसे कोई नहीं दिखा. शायद वह डर गया था और चुपचाप से वहाँ से सरक लिया. अब तो मैं आश्वस्त हो चुका था कि जैसे ही टर्रटर्र कमीज की जेब में जाता है मैं मिस्टर इंडिया की भाँती गायब हो जाता हूँ.


                                           टर्रटर्र को कमीज की जेब में रखते ही मैं गायब हो जाता हूँ

मारे प्रसन्नता के मैं अपनी मुस्कुराहट को रोकने में नाकाम रहा. पर तभी मुझे लगा कि मेरी कमीज के अंदर से कोई आवाज आ रही है. गौर से सुना तो टर्रटर्र बोल रहा था-वह भी मेढक की भाँती नहीं बल्कि इंसान की भाँती. वह कह रहा था ‘आज खाने के बाद चलना हमारी तीसरी दोस्त रानी  से मिलने.’ यह तो गजब हो गया-बोलने वाला मेढक! मैने सोचा, यदि मैंने यह सब बात किसी को बताई तो लोग सोचेंगे ‘पागल हो गया है!’ इसलिए मैंने जल्दी से गर्दन हिला कर टर्रटर्र को कमीज की जेब से निकाल कर पैंट की जेब में रख लिया और अस्तबल से बाहर आ गया. बाहर नाना जी खड़े थे. मुझे देखते ही बोले, ‘वहाँ क्या कर रहे थे, अस्तबल में?’ मैने डरते डरते कहा, ‘कुछ नहीं टुकटुक का खाना देख रहा था.’ नाना जी तुरंत आदेशात्मक स्वर में बोले, ‘अब जाकर अपना खाना भी खा लो.’ 
भूख भी लगी थी और समय भी हो चुका था. उससे बड़ी बात यह थी कि टर्रटर्र ने कहा था कि खाने के बाद तीसरी दोस्त से मिलेंगे. अंदर कमरे में जाकर मैने टर्रटर्र को उसकी सबसे सुरक्षित जगह मेरे जूते के भीतर बैठने के लिए छोड़ दिया. मेरे मन में एक ही प्रश्न था अब, ‘कल टर्रटर्र को ले कैसे जाऊंगा?’ पैंट की जेब में रखना कठिन था. कोट को काठगोदाम आने के साथ ही उतर जाना था. कमीज की जेब में रखने का प्रश्न ही नहीं था. इसलिए मैने तय किया कि यात्रा के दौरान वह मेरे पिठ्ठू की साइड की जेब में रहेगा. खाना खाने के बाद उस दिन लोग उठ ही नहीं रहे थे. मुझे लगा कि यदि यह लोग आराम करने नहीं गए तो हमारा प्लान फेल हो जाएगा!
खैर थोड़ा देर से सही पर सब लोग जब आराम करने चले गए तो मैंने टर्रटर्र को डाला कमीज की जेब में और चल पड़ा टुकटुक के पास. वाह, रास्ते में नानी आ रही थी और उसने मुझे देखा ही नहीं-क्योंकि मैं उसे दिखा ही नहीं. ‘यह तो बड़े काम की चीज मिल गयी मुझे’-मैने सोचा! नित्य की भांति टुकटुक की पीठ पर मैं बैठा तो वह अपने स्थान से हिला तक नहीं. मैने उसकी गर्दन थपथपाई कि चलो भाई जल्दी. पर नहीं वह नहीं बढ़ा. मैने उसकी रास बांधी और हाथ से पकड़ कर बाहर ले आया. तब वह मेरे साथ कुत्ते की तरह चलने लगा. असल में तीसरी फ्रेंड तो रहती थी घर के एकदम पास एक मंदिर के बरामदे की छत में. इसीलिये टुकटुक मुझे बैठा नहीं रहा था. मंदिर के पास पहुँच कर टुकटुक ने एक खास ढंग से हिनहिनाया. भन्न की आवाज से मैं चौंका और देखा कि बर्रों का एक खतरनाक झुण्ड हमारी ओर आरहा है. मैं तो दोनों हाथों से सर ढक कर भागा घर की ओर... तभी पीछे से टुकटुक ने मेरे लिए वही पुरानी भर्र...र्र... वाली आवाज निकाली. पलट कर देखा तो टुकटुक की नाक पर एक चमकदार बर्र बैठी हुई थी. एकदम सुनहरे रंग की थी. उसकी बड़ी बड़ी आँखें तो मैं देखता ही रह गया. उस बर्र के साथ ही पूरा झुण्ड टुकटुक के सर के ऊपर भनभना रहा था. जैसे ही मैं नजदीक गया वह टर्रटर्र की भाँती उड़ कर मेरे सिर के ऊपर बालों के बीच आ बैठी और वह पूरा झुण्ड मेरे ऊपर चक्कर काट रहा था. टर्रटर्र इस समय मेरी पैंट की जेब में था. पड़ोस के कुछ शैतान लड़के टुकटुक को घेरने की तैय्यारी से आ रहे थे और छोटे पत्थर मार कर मुझे डरा रहे थे. उनमे से एक ने मुझे पीछे से पकड़ लिया. पर दूसरे ही क्षण वह दर्द से चीखा और चिल्लाते हुए भागा, ‘भागो यहाँ बर्र का छत्ता है पूरा.’ सारे लड़के भाग गए और हमने चैन की सांस ली.
अब मुझे यह समझ में आया कि जिस जगह यह बड़ी वाली बर्र जाती है, वहीं उसका झुण्ड भी जाता है और जिसके ऊपर वह बैठती है उसकी रक्षा पूरा झुण्ड करता है, क्योंकि उनको अपनी रानी की रक्षा करनी होती है. मुझे एक दिन नानी ने बताया था कि बर्रों और मधुमक्खियों के हर झुण्ड की एक रानी होती है और पूरा झुण्ड उसकी आज्ञा मानता है. इस समय जो बर्र मेरे बालों में बैठी हुई थी वह इस झुण्ड की रानी थी. यह बात तो समझ में आई, परन्तु समस्या फिर वही थी कि इस रानी और इसके झुण्ड को मैं ले कैसे जाऊंगा? मैने देखा जब मैं रानी (बर्र) को अपने बालों में छिपा कर घर के अंदर ले गया तो बाकी सब घर भर में इधर उधर दीवारों से चिपक गयीं. लगता था मानों वे सब मेरी कमांडो हों!


                                  रानी मेरी कमांडो

मेरे सर से फुर्र से उड़ कर रानी ने घर के बाहर एक छज्जे के नीचे स्थान ढूंढ लिया और वहाँ जा बैठी और उसे देखते ही बाकी सब ने मिलकर चुटकियों में वहाँ अपना छत्ता बना डाला. रानी तो वहाँ बैठ गयी, पर उसे बुलाने के लिए क्या करना होगा सोचते सोचते मुझे ना जाने कब नींद आ गयी. माँ ने उठाया, ‘आज खाना नहीं खाना है?’ तब देखा रात के नौ बज चुके थे. पहले जाकर जूते के अंदर टर्रटर्र को देखा. हजरत आराम कर रहे थे. मुझे देख और अंदर घुस गया और बोला, ‘इस समय बाहर नहीं जाऊंगा, बहुत ठण्ड है.’ मुस्कुराते हुए मैंने जूता वहीं रख दिया. फिर हाथ धोने के लिए बाहर गया तो देखा रानी और उसका पूरा कुनबा अपने छत्ते में सो रहा है.
खाना खाकर जब सोने आया तो नींद मानों गायब हो चुकी थी. मैंने यह तय किया कि रानी मेरे बालों में छिपी रहेगी और उसके साथी कार के ऊपर उड़ते हुए आ जायेंगे. टर्रटर्र तो मेरे पिट्ठू की जेब में जाने ही वाला था. सुबह काफी भगदड़ रही, सामान पैक हुआ, हम लोग तैयार हुए. फिर नाश्ते के बाद चलने का समय आ गया. और बार की भाँती इस बार मैं उदास नहीं था, क्योंकि इस बार मेरे साथ मेरे विचित्र दोस्त भी चल रहे थे. मुझे अब स्कूल में या खेल के मैदान में किसी का भय नहीं था. मन में एक अजीब सी उमंग और उत्साह था. कार की छत में भी सामान बांधा गया. जब हमारे बैठने का समय आया उस समय मैं सोच रहा था कि रानी को बुलाऊंगा कैसे? सबसे मैं यह कह कर भागा कि एक बार टुकटुक से बाय कर आऊँ. सबने जाने दिया, क्योंकि सब जानते थे कि मैं उसे कितना प्यार करता था और वह मुझे. पर यह सीक्रेट कोई नहीं जानता था कि मेरा बेस्ट फ्रेंड भी था टुकटुक. उसके अस्तबल में घुसने के पहले ही रानी स्वयं आकर बैठ गयी मेरे बालों में. मानो टुकटुक ने उसे पहले ही एस एम् एस कर दिया हो!


                                     बाय टुकटुक 

चलते समय मैने देखा टुकटुक की आँख से मोटे मोटे आंसू बह रहे थे. मैं अपने आंसू भी न रोक सका. आस्तीन से आंखे पोछते हुए मैं कार में जा बैठा. मुझे ध्यान ही नहीं रहा कि रानी के साथी कहाँ होगे? जैसे ही याद आई मैंने खिड़की से गर्दन निकाल कर देखा कि वे सब बहुत ऊंचाई पर कार के ऊपर उड़ रहे थे. जैसे ही कार चली वे सब छत पर रखे सामान से चिपक कर बैठ गए.
काठगोदाम पहुँच कर हमारे डब्बे की छत पर रानी के साथियों ने कब्जा जमा लिया और हम सब आराम से जा पहुंचे लखनऊ. घर में तो कोई दिक्कत ही नहीं थी. सामने आहाते में बड़ा सा नीम का पेड़ था. हमारा सामान तक अंदर ना सका था कि रानी और उसके साथी नीम पर छत्ता बना चुके थे.
अब बस देरी थी स्कूल खुलने की. कुछ होमवर्क बाकी था, मैथ्स का. जो दो दिन बचे थे छुट्टी के उसमे उसीको पूरा करने में लगा रहा. हाँ बीच बीच में टर्रटर्र को देख लेता था. वह कमरे के मच्छरों का सफाया करने में जुटा हुआ था-इसलिए मैं निश्चिन्त था कि उसे कुछ नहीं होगा!
स्कूल की बातें कल बताऊंगा-अभी जरा बर्रों को देख आऊँ. तब तक के लिए बाय.

  

5 comments:

  1. धन्यवाद सुशील

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  2. बहुत सुंदर और अद्भुत कल्पना। बच्चों को अवश्य भायेगी यह ।

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    1. धन्यवाद सुधीर, अब तो लगता है पूरी किताब लिखनी ही पड़ेगी.

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