Saturday, January 18, 2014

खुल गया स्कूल

स्कूल खुलने के एक दिन पहले डर के मारे नींद ही नहीं आती थी-बस यही चिंता होती थी कि कल मैथ्स टीचर की पिटाई और कालू मोटे की धमकी से कैसे बचा जाएगा! पूरी रात यही मनाता था कि ‘भगवान उन दोनों को बीमार कर दो!’ पर कहाँ, ऐसा कुछ नहीं होता था-उलटे मेरी ही ऑंखें नींद से सूज जाती थीं. पर इस बार ऐसा कुछ नहीं था. नींद आ भी रही थी, पर साथ ही यह भी विचार मन में था कि कैसे सुबह हो और कैसे मैं स्कूल जाऊं! और बार तो ममी उठा उठा कर तंग हो जाती थीं, पर इस बार तो मैं सबसे पहले उठ चुका था. नहा-धो कर फटाफट तैयार हुआ और आ बैठा नाश्ते की मेज पर. बिना ममी की खुशामद के अपने मन से नाश्ता किया और भाग कर गया अपने दोस्त टर्रटर्र को देखने. पहले उसे जूते के अंदर देखा-वहाँ तो वह था ही नहीं. दिल धक से रह गया-कहीं कोई बिल्ली तो नहीं खा गई उसे!

पर मेरा भय अकारण निकला. टर्रटर्र तो पहले ही से मेरे स्कूल बैग में बैठा हुआ था. मैने उसे बैग की बाहर वाली जेब से निकाल कर उसे अंदर वाली जेब में रख दिया. बाहर वाली जेब में ममी टिफिन रखतीं थीं और मेढक देख कर वह उसे फिकवा देतीं.

मैने सोचा ‘आज सिर्फ टर्रटर्र को ले जाता हूँ, तथा आवश्यकतानुसार रानी को बाद में ले जाऊँगा.’ बात यह थी कि मैं नहीं जानता था कि पहले दिन स्कूल में क्या-क्या होगा! मैं बैग को अपनी पीठ में रखे, साईकिल को एक हाथ से पकड़े जा रहा था. जैसे ही नीम के नीचे से निकला, रानी झट से मेरे बालों में बैठ गयी. मैने हलके से उसे उँगलियों से पकड़ हवा में उड़ा दिया. मेरा इशारा रानी तुरंत समझ गयी और वापस चली गयी अपने छत्ते में.

स्कूल में साईकिल स्टैंड में खड़ी कर रहा था कि मेरा दोस्त केनेथ भी आगया. हम दोनों में बहुत छनती थी. हम दोनों स्टैंड से अपनी छुट्टियों की बातें बताते हुए क्लास की ओर चल पड़े. सामने मैंने देखा दूर से कालू मोटा आ रहा था. मैंने मौक़ा पाकर टर्रटर्र को अपनी कमीज की जेब में रख लिया. केनेथ बता रहा था कि इस बार छुट्टी में कहाँ-कहाँ गए. पर अचानक अपने बगल में मुझे न पाकर वह चौंका-पीछे मुड़ कर देखा, आवाजें दीं पर मैं न दिखा. इसी बीच कालू सामने आ गया और साईकिल चलाते हुए एक लात उसने मारी केनेथ की टांग में और बोला, ‘किसे आवाज दे रहा है बे?’ केनेथ ने सुबह, सुबह झगड़ा करना उचित न समझा. और चुपचाप क्लास की ओर चलता गया. मैने सोचा यह सबसे अच्छा समय है कालू को झटका देने का.

मैं उसके पीछे से गया और कस कर एक धौल जमाई उसकी पीठ पर. पहले तो कालू चिल्लाया, ‘केनेथ के बच्चे तुझे देख लूँगा.’ पर जब उसने पलट कर देखा तो केनेथ तो आस-पास में था ही नहीं. उसका माथा ठनका. उसे और डराने के लिए मैंने उसके सामने उसकी साईकिल के पिछले पहिए की हवा निकाल दी. कुछ डर तथा कुछ विस्मय से वह चुपचाप क्लास की ओर चल पड़ा. मैं भी उसके साथ-साथ गया पर बरामदे के एक कोने में मौक़ा पाकर मैने टर्रटर्र को पैंट की जेब में डाल लिया. सामने से इंग्लिश के सर आ रहे थे. उनसे गुड मॉर्निंग कहा उन्होंने अपना सामान मुझे पकड़ा दिया और बोले इसे क्लास में ले चलो, मैं अभी आया. यह तो बहुत अच्छा हुआ, क्योंकि अब ना तो केनेथ और ना ही कालू मेरे ऊपर शक कर सकते थे,

घंटी बजने में दो-तीन मिनिट थे. मैंने सर का सामान मेज पर रखा और अपनी सीट पर जा बैठा. उस समय मेरे चेहरे पर शैतानी वाली एक मुस्कुराहट अवश्य थी, पर मैं जानता था कि उसे कोई समझ नहीं पायेगा. एक बात अच्छी थी कि मेरी सीट दूसरी पंक्ति में सबसे किनारे थी. इसलिए जब मैंने टर्रटर्र को पैंट की जेब से निकाल कर बैग में डाला तो कोई देख न सका. सर ने तो पहले ही दिन छुट्टी में कहाँ गए, क्या किया आदि बातों पर लेख लिखने को दे दिया. बोले कि अभी क्लास में पूरा करो. करता क्या न मारता, लिखना चालू किया. पहले सोचा कि यदि टुकटुक की बातें लिखीं तो सर खिल्ली उड़ाएंगे, पर मैने टुकटुक के साथ की हवाई यात्राओं के बारे में लिख ही मारा.

घंटी बज गई, दूसरी क्लास में जा रहे थे. कालू मोटे को तो बस मानों घंटी की प्रतीक्षा थी. बाहर आते ही उसने एक मुक्का जोर से केनेथ की पीठ पर मारा और बोला, ‘क्यों बे सुबह सुबह मेरी पीठ में क्यों मारा तूने?’ अब यह तो सरासर ज्यादती थी. हम सब दोस्त एक साथ कहने लगे यह गलत बात है, पर कालू तो कालू था. और डराने को बोला आज छुट्टी के समय तुमको देख लूंगा. केनेथ बेचारे की तो हालत खराब थी. पत्ते की भांति काँप रहा था थरथर और उसका रंग सफेद पड़ गया था.

आज तो कुछ करना ही पड़ेगा इस कालू का-मैं सोच रहा था. चार पीरियड समाप्त हुए जैसे तैसे और फिर घंटी बजी इंटरवल की. सब भागे मैदान की ओर. आज कालू, रोज की भांति फुटबॉल खलने नहीं गया बल्कि असेम्बली के सामने पुराने नीम के पेड़ के तने के दो भागों के बीच जमीन से कोई चार फिट की ऊँचाई पर बैठ गया. किसी सोच में डूबा हुआ था. खैर मुझे क्या. मैं तो उससे बात तक नहीं करता था. मैं कुछ दूर किनारे एक बेंच पर बैठा टिफिन खा रहा था. बेचारा टर्रटर्र भूखा होगा, इस क्या खिलाऊँ मैं सोच रहा था. मैने अपना टिफिन बैग में रखा और अंदर हाथ डाला टर्रटर्र को देखने के लिए, पर वह फुर्ती से सरक कर मेरी हथेली में आ बैठा. यह उसका इशारा था कि मुझे अपने पास रखो. मैंने इधर-उधर देखा, कोई देख नहीं रहा था और चुप्पे से उसे अपनी कमीज की जेब में डाल लिया. फिर बस्ते को वहीं छोड़कर मैं जा पहुंचा कालू के पीछे. सुस्त मोटा ऊंघ रहा था. लगता था शायद उसे नींद आ रही थी. मैने तय किया यह सर्वोत्तम मौक़ा है कालू को सबक सिखाने का. मैने पीछे से पूरा जोर लगा कर एक जोर का धक्का मारा कालू को. बेचारा मुंह के बल औंधा गिरा जमीन में. उसका मिट्टी और खून में सना मुंह देखने लायक था.

पहले तो वह आदतन चिल्लाया, ‘कौन है बे?’ पर दूर दूर तक उसे कोई न दिखा. तब शायद वह कुछ डर गया और लगा जोर जोर से रोने. दूर खड़े साइकिल स्टैंड के गार्ड ने शायद उसे देख लिया और भाग कर आया. गार्ड ने भी आस-पास सब ओर देखा, पर वहाँ कोई नहीं था. उसने कालू को समझाया, ‘भैय्या यहाँ कोई नहीं है, आपको नींद आ गयी होगी और आप गिर गए.’

कालू ने गुस्से से उसको भी एक लात मारी और बोला, ‘मैं नहीं सो रहा था और मुझे अच्छी तरह याद है कि किसी ने पीछे से धक्का मारा था.’ तब तक इंटरवल समाप्त होने का समय था, और वहाँ बहुत से बच्चे एकत्रित हो चुके थे. इस बीच मैंने मौका पाकर टर्रटर्र को जेब से बैग में डाल लिया था और मैं भी उसी भीड़ में खड़ा तमाशा देख रहा था. हर बच्चा अपना अपना अनुमान लगा रहा था कि क्या हुआ होगा! तभी बड़ी क्लास का एक लड़का बोला, ‘मुझे भी एक दिन किसी ने धक्का मारा था, जबकि मैं अकेला था. शायद यहाँ कोई भूत-वूत का चक्कर है.’

बस भूत शब्द सूना नहीं कि सब बच्चे भागे वहाँ से, साथ में कालू मोटा भी हाँफते हाँफते भाग रहा था. घंटी भी बज गयी और सबसे कठिन क्लास का सामना करने का समय आ चुका था. वो थी मैथ्स की क्लास. मैंने अपने आप को समझाया कि डर की क्या बात है. होमवर्क तो पूरा है. बस इसी हिम्मत से बैठ गया क्लास में. सर आए, बड़े खड़ूस टाईप सर थे. बस आए और बिना कुछ कहे गुर्राए ‘अपनी अपनी मैथ्स की कॉपी यहाँ जमा कर दो.’ हम लोग एक पंक्ति में जाकर कॉपी सर की मेज में रखते गए. उन्होंने किसी को देखा तक नहीं. बस कालू को देख कर मुस्कुराए, क्योंकि उसको वह घर पर जाकर ट्यूशन पढ़ाते थे. कालू भी उनको देख कर मुस्कुराया, पर होंठ सूजे थे इसलिए ठीक से मुस्कुरा नहीं पाया.

फिर सर ने बोर्ड पर चार प्रश्न लिख दिए ब्याज के. और बोले इनको हल करो और खुद लग गए कॉपी जांचने में. मेरी कॉपी उनके सामने खुली हुई थी. कुछ देर तक तो सही सही निशान लगाते गए और उसके बाद अचानक दहाड़े, ‘जोशी...इधर आओ.’ मैं डरते डरते वहाँ पहुंचा. ‘यह क्या किया है?’ जोर से चिल्लाये. सारा क्लास थर थर काँप रहा था, एक कालू को छोड़कर. और बार तो मैं डर के मारे कुछ सोच भी नहीं पता था, पर आज हिम्मत करके मैंने सोचा, ‘कालू को नहीं छोडूंगा.’ तभी एक जोर का झापड़ पड़ा मेरी कनपटी पर और मेरी कॉपी उन्होंने फेकी दरवाजे के बाहर. फिर चिल्लाये ‘अपना बस्ता उठाओ और बाहर हो जाओ मेरी क्लास से.’

मारता क्या ना करता क्लास के बाहर खड़ा में कुछ देर तक रोता रहा. फिर मैं थोड़ा एक ओर को आ गया और मैने टर्रटर्र को कमीज की जेब में डाल लिया. बस मैं और मेरा बस्ता दोनों हो गए गायब. अब सारी डर दूर हो चुकी थी और मैं तेजी से गया साईकिल स्टैंड की ओर. पर वहाँ तो चेन लगी थी सब साइकिलों पर, जिसमे ताला लगा हुआ था. स्टैंड वाला ऊंघ रहा था. मैंने चुपके से चाभी उठा ली और बिना आवाज किये ताला और चेन खोल डाले. मेरी साइकिल सबसे किनारे थी, इसलिए मुझे कोई दिक्कत नहीं हुई उसे निकलने में. चेन और ताला मैने वापस उसी प्रकार चुपके से लगा दिया. बस उसके बाद मैं फुर्र से उड़ चला. मुझे ध्यान ही नहीं रहा कि मैं पूरे रास्ते अदृश्य ही रहा. याद आया घर के फाटक पर जाकर. किसी प्रकार साइकिल अंदर की और टर्रटर्र को वापस डाला बैग में और घर की घंटी बजाई.

अब पहला काम तो यह करना था कि अपने से किसी बड़े से मैथ्स में क्या गलती की थी वह समझना और दूसरा काम था, कल को मैथ्स सर से निबटना. जो काफी खतरनाक काम था. पर मैंने आज तय कर लिया था कि या तो उनको पाठ पढ़ाऊंगा वरना स्कूल छोड़ दूँगा.

यह सब कैसे होगा यह तो आप लोग अगली कथा में ही पढ़ सकेंगे, कुछ दिनों बाद.
     


  

2 comments:

  1. वाह बहुत अच्छा लिख रहे हैं लिखते चले जायें :)

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  2. धन्यवाद सुशील

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