टुकटुक के दोस्त
टुकटुक से मेरी
दोस्ती बढ़ती जा रही थी. बेचारा बोल तो नहीं सकता था, पर बहुत कुछ बताना चाहता था. मूक
प्राणी अपनी बात बताए भी तो कैसे? दोपहर में दो से चार बजे के बीच जब सब सो रहे
होते, उस समय टुकटुक मुझे लेकर दूर-दूर सैर कराता, तो कभी हवाई यात्रा कराता. झपसट
की अब आवश्यकता ही नहीं पड़ती थी, क्योंकि अब नाना जी भी आश्वस्त हो चुके थे कि मैं
अच्छी घुड़सवारी कर सकता हूँ.
बड़ी प्रसन्नता से
दिन व्यतीत हो रहे थे, पर टुकटुक से बिछड़ने का समय निकट आ रहा था. गर्मी की
छुट्टियाँ समाप्ति पर थीं, स्कूल खुलने का समय निकट आ चुका था और मुझे वापस जाना
था अपने शहर लखनऊ, जहां पापा रहते थे. स्कूल तो मुझे बहुत अच्छा लगता था, पर दो
चीजों से मैं बेहद डरता था. एक तो थे मैथ्स के सर. पढ़ाते कम थे पिटाई ज्यादा करते
थे. उनके क्लास की घंटी बजी नहीं कि मेरे जैसे अनेक बच्चे थर-थर कांपने लगते, किसी
के पेट में अचानक दर्द हो जाता तो किसी को चक्कर आने लगता! उनकी क्लास भी होती थी
ठीक इंटरवल के बाद. मैं अक्सर सोचता कि ‘यह मुआ इंटरवल छुट्टी के समय क्यों नहीं
होता-आराम से कुछ खेलो, कुछ खाओ और जब छुट्टी की घंटी बजे तो घर को जाओ. कोई चक्कर
ही न हो मैथ्स का.’ पर सब घर पर कहते मैथ्स के बिना जीवन में कुछ कर ही नहीं सकते!
पता नहीं ये जीवन-वीवन क्या होता है, मुझे तो बस ये ही मालूम था कि मैथ्स क्लास
में जाओ और मार खाके आओ. दूसरा था हमारा सहपाठी, कालू मोटा. नाम तो उसका कभी याद
नहीं रहा. पर जैसा रूप था वैसा ही उसका टीचरों का दिया हुआ नाम था. स्वभाव से उग्र
वह किसी को भी बिना बात पीट देता. उसके पिताजी थे कोई राजनेता सो उससे सब टीचर भी
डरते थे.
मैं रोज मनाता कि
‘आज कालू का सामना न हो, या आज वो बीमार पड़ जाए!’ पर कहाँ वह तो भैसे की तरह खाता
और कभी बीमार ही नहीं पड़ता था.
छुट्टी समाप्त होने
के एक दिन पहले मैं इन्ही दो लोगों से सामना होने के डर से बेहद परेशान था.
बार-बार माँ से कहता कुछ दिन और रुकने दो यहाँ. पर कौन सुनता है बच्चों की बात.
आखिर मुझे अपने ‘बेस्ट फ्रेंड’ की शरण लेनी पड़ी. दिन में सब सो रहे थे. टुकटुक
अपने अस्तबल में खड़ा घास खाने में मग्न था. मुझे आता देख उसकी आँखों में अजीब सी
चमक आ गयी. उसने गर्दन हिला कर दोनों होंट मिलाकर मुंह से भुर्र..र्र..र्र. की
आवाज निकाली. जी हाँ, उसका यही तरीका था मुझसे बात करने का. मेरी सूजी आँखें देख
शायद वो समझ गया कि कुछ परेशानी है. मैं उसके सामने जा खड़ा हुआ और टुकटुक प्यार से
अपना माथा मेरी छाती पर रगड़ने लगा. मैने जैसे ही अपने छोटे से हाथों से उसके गाल पकड़े
मुझे रोना आ गया. टुकटुक ने अपना मुंह मेरे गाल से सटा दिया, उसकी धौंकनी जैसी
सांस मानों मुझसे कह रही थी, ‘उड़ेल दे बिज्जी अपना सब दुःख, मत रख अपने अंदर कोई
भी बात.’ बस मैंने उसका इशारा समझ लिया और अपने टीचर और कालू की सब बातें विस्तार
से बता दी टुकटुक को. मैने देखा जैसे ही मेरी बात पूरी हुई, टुकटुक एक कदम पीछे
हटा और उसने अपने पीछे के दोनों पैरों को झुकाया. यह उसका इशारा होता था, कि मेरी
पीठ पर बैठो. अस्तबल में खड़े टुकटुक की पीठ पर जीन, रकाबी, रास कुछ भी नहीं लगी
होती थी. पर वो तो मेरा पक्का दोस्त बन चुका था और मुझे उन सबकी आवश्यकता ही नहीं
थी. मैं जब उसकी पीठ पर बैठा होता तो वह ऐसे संभल कर चलता कि मुझे तनिक भी झटका न
लगे.
मैं उचक कर उसकी पीठ
पर जा बैठा. मेरे बैठते ही टुकटुक बड़ी सफाई से झुकते हुए मेरे समेत अस्तबल के
दरवाजे के पार हो गया. वह मुझे लेकर आज एक नए रास्ते पर जा रहा था. यह रास्ता घाटी
की ओर जाता था. मैं उसकी गर्दन से लिपटा हुआ था और टुकटुक धीरे धीरे नीचे उतर रहा
था, ताकि मेरे गिरने का भय ना हो. ढलान तेज थी. साथ ही रास्ते में रोड़ी भी बहुत
थी. टुकटुक बीच बीच में फिसल जा रहा था, पर लगता था मानों उसने स्केट पहन रखे
हों-जब भी फिसलता आगे के दो पैर थोड़ा और आगे रख लेता और पीछे के दोनों पैरों को भी
थोड़ा आगे आने देता. इस प्रकार हर बार दस-बारह इंच सरक जाता-पर मुझे पता भी नहीं
चलता. पर हाँ मैंने उसकी गर्दन कस कर पकड़ रखी थी-जैसे स्कूटर में पीछे बैठ कर मैं
अपने पापा की कमर को पकड लिया करता था.
काफी देर बाद हम नदी
के किनारे पहुँच चुके थे. पहाड़ों में नदियाँ बहुत शोर मचाती हुई बहती हैं. यह नदी
पतली थी, पर इसकी धारा में वेग बहुत था और इसकी लहरें जब पत्थरों से टकराती तो
बहुत आवाज करतीं. मैंने इस स्थान को पहले कभी देखा ही नहीं था. वहाँ जाने को नाना
जी मना किया करते थे. कहते थे वहाँ मुर्दाघाट है. ये तो ज्ञात नहीं था कि
मुर्दाघाट क्या होता है, पर दोस्त लोग बताते थे कि वहाँ भूत रहता है. डर के मारे
थर, थर काँप रहा था मैं. पर अजीब पसोपेश में था-एक ओर मेरे पक्के दोस्त के ऊपर
मेरा विश्वास था और दूसरी ओर नाना जी की डाँट तथा मुर्दाघाट के भूत का भय. नानी
कहती थी कि ‘जब भी डर लगे तो आँखें बंद कर मन में भगवान का नाम लो.’ टुकटुक की
गर्दन से लिपटा आँखे भींचे वही कर रहा था मैं.
अचानक पानी की आवाज
गायब सी हो गयी. आँखे खोली तो पहले समझ में ही नहीं आया, ‘ये कहाँ ले आया टुकटुक!’
अंधेरी सुरंग सी थी. नीचे थोड़ा पानी भी था. शायद कोई बड़ी सी गुफा थी! एक जगह पानी
कुछ रुका हुआ था और वहाँ पर एक छोटा सा ताल बन गया था. टुकटुक ने अपने पिछले पैर मोड़
कर मुझे उतरने को इशारा किया. फिर पानी में अपनी नाक डाल कर कुछ ढूँढने लगा. मैं
समझा वह पानी पी रहा है.
और तभी टुकटुक की
नाक पर उछल कर बैठ गया एक छोटा सा मेंढक. अपनी नाक आगे बढ़ा कर मेंढक से टुकटुक ने
मेरी मुलाक़ात करवा दी. उसका नाम क्या था मालूम नहीं, पर मैंने उसका नाम उसी समय रख
दिया टरटर. मैंने देखा वह मेरी ओर बड़े गौर से देख रहा है. जैसे हम दोस्त आपस में
पहली बार मिलते हैं और ‘हाई’ कह कर पक्के दोस्त बन जाते हैं, कुछ वैसे ही नन्हे से
टरटर ने टुकटुक की नाक से छलांग लगा दी और मेरे कोट के कॉलर पर आ बैठा. पहले तो
मैं बहुत डरा. मैंने कभी मेंढक को इतने निकट से देखा ही नहीं था. पर जब उसको गौर
से देखा और उसने अपनी पतली सी जीभ बाहर फेक कर मानों मुझे ‘हाई’ कहा! अरे ये क्या,
टरटर ने अपनी एक आँख बंद कर मुझे आँख भी मारी. मैं मन ही मन सोच रहा था ‘ये तो बड़ा
शैतान मेढक लगता है!’
टुकटुक ने मुझे एक
बार फिर अपनी पीठ पर बैठने का इशारा किया. हम लोग बाहर निकले, इस बार हम दो नहीं
बल्कि तीन दोस्त थे. बाहर नदी के किनारे कुछ लड़के खेल रहे थे. मुझे मालूम नहीं था
कि चुपचाप सरक कर टरटर मेरी कमीज की जेब में बैठ चुका था. लड़के आपस में बात कर रहे
थे, ‘अरे देखो कैसा काला घोड़ा, अकेले जा रहा है!’ मेरी समझ में नहीं आया कि ये
मुझे क्यों नहीं देख पा रहे हैं. जैसे ही वह नजदीक आये टुकटुक ने दुलत्ती झाड़ी और
हिनहिनाते हुए भागा. उसकी तेज चाल से मैं डरा कि कहीं टरटर गिर ना जाए. तब देखा कि
वह हजरत तो मेरी जेब में आराम से बैठे हैं. लड़के दौड कर हमारा पीछा कर रहे थे.
मैंने डरते हुए टरटर को दो उँगलियों से पकड़ कर निकाला. छी कितना लिजलिजा सा,
गीला-गीला सा था वो. घिन अवश्य आ रही थी, पर क्या कर सकता था! तभी पीछे से आवाज
आई, ‘अरे काले घोड़े पर वह लड़का कहाँ से आ गया?’ लगता था उन्होंने मुझे देख लिया था
अब. तब तक सर्र से मेरे बगल से एक पत्थर निकल गया. लड़के पत्थर मार रहे थे. टुकटुक
ने सारी बात समझते हुए अपनी चाल तेज करदी. कहीं गिर ना जाए इसलिए मैंने टरटर को आहिस्ता से पकड़ कर फिर जेब में
रखा ही था, कि पीछे से आवाज आई, ‘अरे, लड़का कहाँ गायब हो गया?’
मेरी समझ में अब यह ‘मिस्ट्री’
आ चुकी थी. टरटर जेब में रखते ही मैं ‘मिस्टर इंडिया’ की भाँती गायब हो जाता था!
दूसरी बात यह समझ में आई कि मुझे इतनी दूर गुफा में टुकटुक सिर्फ इसलिए लाया ताकि
वह मुझे टरटर से मिलवा दे और उसे अपने साथ ले जाने दे.
मेरा दिमाग तेजी से
घूम रहा था. मैं सोच रहा था यदि यह सच हुआ तो मेरे तो स्कूल में मजे ही मजे हैं.
मैथ्स टीचर की मार से भी बच ही जाऊंगा! टरटर को अपने साथ रख और क्या, क्या कर सकता
हूँ आदि बातें मैं सोचने लगा. टरटर को कमीज की जेब से निकाल कर कोट की जेब में रख
कर मैं टुकटुक से कस कर
लिपट गया और घर पहुँचने तक वैसा ही लिपटे रहा. मेरी तंद्रा तब भंग हुई जब टुकटुक
फुर्ती से मुझे लिए हुए अपने अस्तबल में घुस गया और आराम से ऐसे घास चरने लगा,
जैसे वह कहीं गया ही न हो!
टरटर के साथ मैंने
क्या क्या मजे किये पढ़ने के लिए प्रतीक्षा कीजिए. दूसरे दिन टुकटुक ने एक और दोस्त
से दोस्ती करवा दी-वह तो बहुत ही मजेदार निकली. बस धीरज रखिये सारी कहानी आपके
सामने आ जाएगी आने वाले दिनों में. तब तक के लिए बाय.
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