रानी का कमाल
स्कूल के पहले दिन ही मैथ्स क्लास में मार खाने और निकाल दिए जाने के
बाद से मैं बेहद उदास था, परेशान भी था, कि आगे कैसे काम चलेगा. कठिनाईयां अनेक
थीं. बच्चे की बात को कोई नहीं सुनता, ना कोई समझता है. सबको यही लगता है कि बहाने
बना रहा है. भला बताओ मित्रों इन बड़े लोगों ने जब मैथ्स बनाई तो उस समय सोचना
चाहिए था ना कि यदि किसी को ना समझ में आये तो क्या करना होगा! उधर मैथ्स सर की
क्या कहूँ, छह अंको का प्रश्न दे दिया-अब अगर उनमे से मैने तीन को घटा दिया और तीन
को जोड़ दिया तो इतना घनघोर अपराध हो गया कि मुझे मार कर क्लास के बाहर कर दिया.
घर आकर मेरा किसी कार्य में मन नहीं लगा. खाना भी नहीं खाया गया मेरे
से. खाने के बाद पापा-ममी सब लोग आम खा रहे थे, पर मैं, ‘मन नहीं है’ कह कर अपने
कमरे में चला गया. दोनों इतना मशगूल थे आम खाने में कि उन्होंने मेरे मुहं को एक
बार देखा तक नहीं. वरना उनको शायद अनुमान लग जाता कि मैं किसी समस्या में हूँ.
कमरे में आकर इसी ऊहापोह में था कि कल क्या होगा, तो इतने में फोन की घंटी बजी.
चाचा का फोन था. इस दुनिया में नाना के बाद यदि कोई मुझे समझता था तो वे थे चाचा
जी. मेरी आवाज से ही ना जाने उनको कैसे अनुमान लग गया कि मैं परेशान हूँ! मेरे
बिना कुछ कहे, वे खुद ही बोले, ‘क्या बात है बेटे कुछ परेशानी है क्या?’
उत्तर में मुझे रोना आगया. मेरे आंसू तो चाचा किसी किसी कीमत पर नहीं
देख सकते थे. लखनऊ के पास में ही एक कस्बा है बख्शी का तालाब, वे वहाँ पोस्टेड थे.
बस हमारी बात अभी हुई भी नहीं थी कि तपाक से बोले, ‘तुम फोन रखो, मैं अभी आ रहा
हूँ.’ मैं बिना किसी को बताए सीधा बिस्तर में घुस गया और चाचा की प्रतीक्षा करने लगा.
मुश्किल से बीस मिनिट बीते होंगे कि चाचा की गाड़ी का हॉर्न सुनाई दिया. वे सीधा
पहले मेरे पास आये. आते ही मुझे गोदी में उठा लिया और विस्तार से सारी बात जान ली.
उसके बाद उन्होंने मैथ्स की होमवर्क कॉपी माँगी, और मेरे सारे गलत सवाल ठीक किये,
मुझे समझाया, सिखाया कि जैसे जोड़-घटाना किया जाता है. मैं इतना बुध्धू भी नहीं था,
सिर्फ मैथ्स टीचर के भय के कारण गलतियां करता था.
उस रात चाचा मेरे पास ही सोये और मुझमे एक नया आत्मविश्वास जगा गए कि
कल से तुम मार नहीं खाओगे. पर कल जो मार खाई थी, उसका हिसाब तो चुकाना ही था
मैंने. इसलिए दूसरे दिन स्कूल जाते समय जैसे ही रानी मेरे बालों में बैठी, मैं आगे
बढ़ता रहा. मैं हजरतगंज से गुजर रहा था, मेरे बैग में था टर्रटर्र और बालों में थी
रानी और करीब पचास फिट ऊपर उड़ रहा था कोई एक हजार बर्रों का झुण्ड. यदि किसी ने
उनको देखा भी होगा तो यही सोचा होगा कि ‘छत्ता बनाने जा रही होंगी कहीं!’. स्कूल
के अंदर भी किसी को पता ना चला. मैंने सोचा कि मैथ्स क्लास तो इंटरवल के बाद होती
है, तब तक इनको अपने साथ क्यों रखूं! इसलिए रानी को निकाल कर उसी पेड़ की ओर उछाला
जिस से कल कालू मोटा गिरा था. रानी इशारा समझ गयी और वे और उसके साथी पेड़ के तने
के ऊपरी भाग से चिपक गए.
मैं क्लास जाने के लिए सड़क पार कर रहा था तो देखा मोटा आज लाल बत्ती
वाली कार में आ रहा है. मेरे बिलकुल करीब आकर कार ने ऐसा चीं... करके ब्रेक मारा
कि मैं उछल कर दो फुट आगे गया. मोटा कार से उतरा, उसके साथ एक बंदूकधारी पुलिस भी.
आदतन, ‘क्यों बे देहाती’ कहते हुए वो मेरी ओर लपका. पर तभी उसके ड्राइवर ने पूछा
‘भैय्या, छुट्टी कितने बजे होगी?’ कालू मुड़ा जवाब देने और मैं ये जा, वो जा. रोज
की तरह सामने से इंग्लिश सर आ रहे थे. उन्होंने अपना सामान मुझे पकड़ा दिया-वो
सामान मेरे लिए सुरक्षा कवच का काम करता था, क्योंकि उसे लेकर जाने वाले को मोटा
कभी नहीं तंग करता था, और खुद कभी हाथ भी नहीं लगता था सर के सामान को-उसकी
बेइज्जती जो हो जाती.
क्लास की सुरक्षित दीवारों के अंदर पहुँच कर मैने मन ही मन ऊपर वाले
को धन्यवाद दिया, कि आज मोटे की लात से बच गए! कल की घटनाओं से मोटा कुछ डरा हुआ
लग रहा था. उसकी सुरक्षा में आया हुआ वो तोंदू सिपाही, क्लास के दरवाजे पर खड़ा हम
सबको घूरते हुए ऐसे मूंछें तरेर रहा हो मानों हमलोग कोई चोर उच्चक्के हों! खैर
ज्यादा देर तक परेशान नहीं होना पड़ा, हमारे सर आ गए. उन्होंने आते ही पहले उस
सिपाही को कहा कि ‘यहाँ क्लास के अंदर बच्चों की सुरक्षा कि जिम्मेदारी मेरी है,
इसलिए आप वो उधर बेंच पर बैठ जाइए.’ वैसे भी उस सिपाही की हालत ऐसी नहीं थी कि
घंटा-दो घंटा लगातार खडा रह पाता. वह खुशी से जाकर बेंच पर बैठ गया. मेरी सीट से
वह बेंच दिख रही थी और मैने देखा कि कुछ देर तो वह खैनी आदि मसलता रहा फिर खैनी का
अन्ता मुंह में दबा कर ऊंघने लगा. मेरे देखते ही देखते उसे गहरी नींद आ चुकी थी.
एक के बाद एक क्लास होती गयी. और फिर बज गई इंटरवल की घंटी. ऐसा लगा
मानों क्लास में भूचाल आ गया हो. सब भागे क्लास के बाहर मैदान में. मोटा पीछे पीछे
आ रहा था, कुछ हांफता हू चिल्ला रहा था, ‘आज मैथ्स सर के घर में मिट्टी हो गयी है
इसलिए आज क्लास नहीं होगी.’ इस तरह के ऐलान करने की उसकी रोज की आदत थी. इसलिए
किसी ने उसकी बात पर ध्यान नहीं दिया. सब लोग चले गए खेलने. आज तो मोटा भी मैदान
में फुटबॉल खेल रहा था. दूर से ऐसा लग रहा था कि फुटबॉल के पीछे एक बड़ी फुटबॉल भाग
रही हो! मै अपनी कल वाली बेंच पर बैठ कर खाना खाने लगा. मैने यह तय किया कि लड़कों
के आने के पहले ही रानी को उठा कर बालों में रख लूंगा.
खाना खाने के बाद कुछ देर मैं यूं ही मैथ्स कॉपी के पन्ने पलटते रहा
और सोच रहा था कि क्लास में आज ना जाने मेरी क्या गत बनाएगा मास्टर. सोचते सोचते
एक कुटिल सी मुस्कान मेरे होंटों पर आई, कि आज रानी क्या गत बनाएगी उसकी! मैदान
में रेफरी की सीटी बज चुकी थी कि गेम का समय समाप्त हो चुका है. मैं भी आहिस्ता से
उठा और नीम के नीचे चला गया. रानी तुरंत मेरे बालों में आकर छिप गई, जैसे उसे पहले
से मालूम था कि अब क्या करना है. साथ ही उसका पूरा झुण्ड भी पर फड़फड़ा रहा था, साथ
चलने को तैयार. जैसे ही घंटी बजी, मैं औरों से थोड़ा पहले चल पड़ा क्लास की ओर. मेरे
बैठते ही, कोई आठ-दस बर्र तो क्लास की दीवारों और खिड़कियों पर चिपक गई. बाकी सब
क्लास के बाहर छत से चिपक कर बैठ गयी. लग रहा था जैसे आते हुए दुश्मन को देख कर
सैनिक छिप कर घात लगाते हैं, कुछ वैसे ही रानी और उसकी फ़ौज भी घात लगा कर बैठ चुकी
थी.
मैथ्स सर आये. अबसे पहले मेरा नाम पुकारा आज उन्होंने. कुछ क्षण को तो
मुझे लगा कि आज फिर मार पड़ेगी! पर चाचा की बात याद क्रेट हुए मैंने हिम्मत नहीं
छोड़ी और चल पड़ा सर की ओर कॉपी लेके. आधे रास्ते में था कि वो दहाड़े, ‘बैग भी साथ
ले आते तो तुमको वापस नहीं जाना पड़ता!’ मैने उनकी बात अनसुनी करदी और कॉपी उनके
आगे रख दी. आज तो कोई प्रश्न गलत था ही नहीं इसलिए मारने का तो प्रश्न ही नहीं था.
कॉपी चेक कर उन्होंने तिरस्कार से मेरे आगे फेक दी और बोले, ‘ठीक है आज बच गए,
लगता है किसी की मदद ली है तुमने!’ मैं अपनी सीट पर वापस आ गया. मेरे बाद सभी की
कॉपी चेक हुई. मजे की बात यह कि मोटे की कॉपी सर ने अपने बैग से निकाली, चेक करने
का नाटक किया और उसे प्यार से बुला कर वेरी गुड कहते हुए कॉपी उसे दे दी. मोटे का
सिपाही बाहर दरवाजे पर खड़ा था. मैं सोच रहा था, अच्छा हुआ कि आज मुझे निकाला नहीं,
वरना इस सिपाही के साथ खड़ा रहना पड़ता.
आज मास्टर जी ब्याज के सवाल करा रहे थे. अचानक एक प्रश्न लिखवाया और
मुझे बोर्ड पर उसे हल करने को कहा. मारे डर के मुझे बोर्ड भी धुंधला दिख रहा था.
हाथ काँप रहे थे. चौक हाथ से छूट जा रही थी. मेरे समझ के बाहर था यह प्रश्न. मैंने
काफी देर कोशिश की, फिर उनसे कहा, ‘सर नहीं समझ में आ रहा है.’
सर अचानक खड़े हुए, अपनी बड़ी बड़ी लाल आँखों से गुस्से से मुझे घूरते
हुए दहाड़े, ‘तुमको जब तक दो हाथ न पड़ें तुम्हारी समझ में कुछ नहीं आता.’ नजदीक आकर
अभी हाथ उठाया ही था उन्होंने, कि अचानक जोर से दर्द से चीखे. हुआ यूँ की जैसे ही
सर दहाड़े मैंने अपने बालों के बीच रानी के परों की हरकत महसूस की. यह शायद उसका
इशारा था बाकी फ़ौज के लिए ‘सावधान, तैयार हो जाओ, हमला हो सकता है.’ और दूसरे ही क्षण
सर की चीख सुनाई दी.
पहले तो तीन-चार ही बर्र उनके चेहरें पर चिपकी, बस उसके बाद तो बाकी
सब भी आकर उनको काटने लगी. सर का बुरा हाल था.
हाथों से मुंह छिपा रहे थे तो दोनों हाथों में भी काट लिया. सब बच्चे
घबरा गए थे यह देख कर. पीछे वाला दरवाजा खुला था, सब भागे उधर से ही. मैं भी सबके
पीछे भागा. मोटू को उसके सुरक्षा गार्ड ने जल्दी से बाहर निकाला और सीधे भागा
प्रिंसिपल साहेब के कमरे की ओर. हम सब बाहर लॉन में खड़े हो गए. हम सबको देख आकर
बाकी क्लास के टीचर भी निकल आये और पूछने लगे ‘क्या हुआ?’ उनको बताया तो वे लोग
डरते डरते गए क्लास की ओर. उधर मोटू के सिपाही ने प्रिंसिपल सर को बता दिया, साथ
ही मोटू के घर फोन कर दिया कि फौरन गाड़ी भेजो. प्रिंसिपल सर, साथ में दफ्तरी, बड़े
बाबू, चपरासी आदि की फ़ौज दौड़ी हमारी क्लास की ओर. मैंने दूर से देखा, मैथ्स सर
बेहोश से पड़े थे अपनी कुर्सी पर, उनका थोबडा देख कर लग रहा था जैसे कहीं से बुरी
तरह पिट कर आये हों. जगह जगह लाल लाल फूल आया था.
सर का चेहरा बुरी तरह फूल चुका था.
देख कर बड़ा दुःख हुआ, पर अंदर ही अंदर खुशी भी हुई कि कमसे कम आज का
दिन मार से बचे!
पूरा पीरियड तो इसी में चला गया, और घंटी बजी-हम सब पहले से ही तैयार
थे, भागने को. जैसे ही मैं बाहर आया क्लास के मेरे पीछे पीछे सारी की सारी बर्र भी
आ गई. हम सब दोस्त आज की घटना पर बात करते हुए चल पड़े साइकिल स्टैंड की ओर. मोटू
तो पहले ही जा चुका था अपने गार्ड के साथ.
केनेथ मुझसे बोला, ‘आज बच गए दोस्त वरना मैथ्स सर तो शायद आज तुम्हारी
चटनी ही बना देते!’ उसको बताने को मैने कह दिया, ‘हाँ यार आज तो बच ही गए.’ पर मैं
जानता था कि अब मैथ्स सर कभी मार नहीं पाएंगे.
उस दिन मैं युद्ध जीत कर प्रसन्न मुद्रा में घर लौटे सिपाही की भाँती
घर में घुसा. ममी भी समझ गई कि आज कुछ अच्छा हुआ होगा....


वाह :)
ReplyDeleteधन्यवाद सुशील
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