बेतुकी कहानियाँ
परों वाला घोड़ा
बहुधा लेखक कहते हैं, 'यह कथा सच्ची घटनाओं पर आधारित है.' मैं केवल यह कहना चाहता हूँ कि इस ब्लॉग की बच्चों के लिए लिखी गयी समस्त कथाएँ निराधारित हैं. यह कथाएँ बालमन की बेतुकी उड़ाने हैं.
मेरे नाना जी के पास एक काले रंग का घोड़ा हुआ करता था-टुकटुक. ऊंचे कद के, घने अयाल वाले, 'टुकटुक' के माथे पर एक सफेद टीका था. उस टीके पर अकसर नाना जी का सईस, झपसट लाल रंग का तिलक लगा दिया करता था. नाना जी को टूर पर जाते, आते सरपट चाल से टुकटुक की पीठ पर बैठे देख कर मुझे भी बड़ा मन करता कि मैं भी उस पर सवारी करूँ. उस दिन जब नाना जी ने स्वयं मुझे अपने साथ बैठा कर टुकटुक की सवारी करवाई तो आनंद ही आ गया. अब जब भी मौक़ा मिलता मैं झपसट के साथ टुकटुक की पीठ पर बैठ कर पहाड़ी ढलानों पर सरपट दौड़ का आनंद लेने से नहीं चूकता था.
एक दिन की बात है, सांझ होने में थोड़ी देर थी, नाना जी सो रहे थे और मैं चुपके से सईस के साथ घूमने निकला था. टुकटुक, दुलकी चाल से पहाड़ की चढ़ाई चढ़ रहा था. मार्ग में एक दूकान मिली. मुझे रास थमाते हुए, झपसट ने टुकटुक को किनारे खड़ा किया और स्वयं उतर कर चला गया कुछ लेने. जैसे ही वह गया, टुकटुक ने पीछे मुड़ कर मुझे देखा और गर्दन हिलाकर मानों पूछा, 'चलें?' मुझे कुछ समझ में नहीं आया पर मैंने भी उसकी बात मानते हुए गर्दन हिलाकर 'हाँ' कर दिया. बस हाँ करने की देरी थी कि टुकटुक भाग चला तेजी से. मैं उससे कस कर लिपट गया. टुकटुक ने सड़क के मोड़ से सीधे घाटी की ओर छलांग लगा दी. मुझे क्षण भर को लगा कि अब तो हम दोनों खड्ड में गिर कर समाप्त हो जायेंगे! मैं कस कर उससे लिपट गया.
पर यह क्या, टुकटुक तो हवा में उड़ने लगा. कुछ देर बाद मैंने देखा कि हम लोग बहुत ऊपर आकाश में चिड़ियों के साथ उड़ रहे हैं. नीचे बहुत नीचे मुझे छोटे छोटे माचिस के डिब्बों से भी छोटे घर दिखने लगे-बहुत गौर से देखा तो वो मेरे गाँव के घर थे.
टुकटुक शायद मेरे मन की बात भांप गया, अपने पैरों को थोड़ा सिकोड़ते हुए कुछ नीचे आ गया. इस ऊंचाई से वो प्रधान जी का लाल छत वाला घर सबसे पहले पहचान में आया. फिर दिखा अपना स्कूल. मैंने देखा स्कूल के कच्चे रास्ते पर मनटन मास्साब एक हाथ में बेंत लिए और दूसरे में किताबें चले जा रहे थे. मास्साब को बच्चे और पशु दोनों नापसंद थे. दोनों की बेंत से पिटाई करते. एक दिन बाजार में टुकटुक उनको छूटा हुआ निकल गया. नाना जी ने झपसट को कहा कि टुकटुक को फलां दूकान के सामने ले आना. भीड़ थी, टुकटुक उस भीड़ से निकलते समय उनको छू गया. बस उन्होंने आव देखा ना ताव, अपने बेंत से दो लगाए कास कर उसे. वो तो बेचारा शरीफ घोड़ा था, कोई शैतान होता तो दुल्लती झाड़ देता वहीं. उस दिन, टुकटुक ने भी लगता था उनको ऊपर से ही पहचान लिया था. उसने अपने चारों पैर ऐसे फैला दिए मानों किसी बड़े पक्षी के पंख हों, और जोर से हिनहिनाते हुए, पूंछ उठा कर नीचे चल रहे मनटन मास्साब के ऊपर 'पौटी' कर दी. जैसे ही मास्साब ने अपनी गंजी खोपड़ी में कुछ महसूस किया-हम दोनों को ऊपर से ही अनुमान लग गया. उनकी हालत को सोच कर मुझे जोर की हंसी आ गयी, टुकटुक ने भी हिनहिना कर अपनी प्रसन्नता व्यक्त कर दी!.
जब तक मास्साब ऊपर देख कर पहचान पाते कि 'ये कौन सा पक्षी है जो घोड़े की तरह लीद कर रहा है', तब तक टुकटुक आँखों से ओझल हो चुका था.
झपसट को थी अफीम खाने की बीमारी. अफीम क्या होती है यह तो मैं नहीं जानता था, पर जब भी घूमने जाते तो वह टुकटुक को उसी रस्ते ले जाता और उसे पेड़ की डाल से बाँध कर घुस जाता दूकान के अंदर. लौट कर वह कुछ देर खूब प्रसन्न रहता पर उसके बाद टुकटुक को बहुत मारता था. मेरी और टुकटुक की दोस्ती हो चुकी थी. मुझको उसका टुकटुक को मारना बिलकुल पसंद नहीं था. हमारी दोस्ती गहराती गई और अब हम एक दूसरे की बात भी समझ लेते थे. जैसे ही वह टुकटुक को बांध कर दूकान में जाता, मैं रास को खोल देता. और टुकटुक मुझे लेकर दूर-दूर तक हवा में सैर कराता. टुकटुक की हवा में उड़ने वाली बात 'सीक्रेट' थी, जिसे केवल मैं ही जानता था. नाना जी को भी नहीं मालूम था. हम दोनों को कुछ देर तक ढूंढ कर फिर झपसट घर लौट आता. पर तब तक अफीम के नशे में उसे होश नहीं रहता और वह सो जाता. हम दोनों उसकी लत का भरपूर लाभ उठाते और नित्य नई जगहों की सैर किया करते.
अगली बार बताऊंगा टुकटुक की और सीक्रेट बातें-तब तक के लिए बाय...
जब तक मास्साब ऊपर देख कर पहचान पाते कि 'ये कौन सा पक्षी है जो घोड़े की तरह लीद कर रहा है', तब तक टुकटुक आँखों से ओझल हो चुका था.
झपसट को थी अफीम खाने की बीमारी. अफीम क्या होती है यह तो मैं नहीं जानता था, पर जब भी घूमने जाते तो वह टुकटुक को उसी रस्ते ले जाता और उसे पेड़ की डाल से बाँध कर घुस जाता दूकान के अंदर. लौट कर वह कुछ देर खूब प्रसन्न रहता पर उसके बाद टुकटुक को बहुत मारता था. मेरी और टुकटुक की दोस्ती हो चुकी थी. मुझको उसका टुकटुक को मारना बिलकुल पसंद नहीं था. हमारी दोस्ती गहराती गई और अब हम एक दूसरे की बात भी समझ लेते थे. जैसे ही वह टुकटुक को बांध कर दूकान में जाता, मैं रास को खोल देता. और टुकटुक मुझे लेकर दूर-दूर तक हवा में सैर कराता. टुकटुक की हवा में उड़ने वाली बात 'सीक्रेट' थी, जिसे केवल मैं ही जानता था. नाना जी को भी नहीं मालूम था. हम दोनों को कुछ देर तक ढूंढ कर फिर झपसट घर लौट आता. पर तब तक अफीम के नशे में उसे होश नहीं रहता और वह सो जाता. हम दोनों उसकी लत का भरपूर लाभ उठाते और नित्य नई जगहों की सैर किया करते.
अगली बार बताऊंगा टुकटुक की और सीक्रेट बातें-तब तक के लिए बाय...
बहुत सुंदर !
ReplyDeleteकृपया वर्ड वेरिफिकेशन डिसऐबल करें ताकि टिप्पणी करने में आसानी हो !
वर्ड वेरिफिकेशन डिसेबल कर दिया. आशा है अब दिक्कत नहीं होगी!
ReplyDeletemujhe to maza aaya
ReplyDeleteधन्यवाद हितेंद्र. मेरा प्रथम प्रयास था. अब इसे आगे बढाने की कोशिश में लगा हूँ.
DeleteAap ko en kahaniyo ke saath saath badhiya rangeen rekha-chitr bhee dena chahiye fir to aap chacha Nehru kahlane lagrnge!
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ReplyDeleteसुझाव के लिए धन्यवाद उपाध्याय जी-आज के ब्लॉग में फोटो लगायी हैं. सुधरने की चेष्ठा जारी रहेगी.
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