Saturday, February 8, 2014

मैथ्स सर की तो हो गई छुट्टी

कहाँ तो स्कूल के नाम से ही पेट में दर्द होने लगता था और कहाँ आज की घटना के बाद से स्कूल जाने की इतनी व्यग्रता हो रही थी कि रात नींद तो मानों आँखों से कोसों दूर भाग गई थी. बस हर समय यही लग रहा था कि कब सुबह हो और कब स्कूल जाऊं. स्कूल जा कर देखना था ना कि मैथ्स सर का क्या हाल हुआ होगा! उनका फूलगोभी की भाँती फूला हुआ चेहरा देखने की इच्छा बलवती होती जा रही थी. जब सुबह का इंतजार अधिक होता है तब रात भी अधिक लंबी हो जाती है. अनेक बार ऐसा लगा कि सुबह हो गयी. रात भर यही उठापटक चलती रही और ना जाने कब गहरी नींद आ गई. सपने में देख रहा था की मैथ्स सर मुझे दोनों कन्धों से पकड कर झकझोर रहे हैं, साथ ही किसी के जोर जोर से पुकारने की आवाज भी सुनाई दे रही थी. नींद खुली तो देखा, ममी हिला-हिला कर उठा रही थीं और कह रही थें ‘आज स्कूल नहीं जाना है क्या?’
खैर किसी जल्दी-जल्दी तैयार हुआ, नाश्ता भी फुल स्पीड में खाया और उससे भी तेज साईकिल चला कर पहुँच गया स्कूल. उस दिन टर्रटर्र को तो ले गया था, पर रानी को घर पर ही छोड़ दिया-क्योंकि मुझे अनुमान था कि मैथ्स सर इतनी जल्दी ठीक होने वाले नहीं और यदि हो भी गए होंगे तो भी शायद बच्चों की पिटाई न कर सकें!
क्लास में घुसते ही सभी बच्चे उत्सुक दिखे मैथ्स सर का हाल जानने के लिए. केवल एक ही व्यक्ति ऐसा था जो सही हाल बता सकता था, उनका-वह था मंत्री पुत्र मोटू. पर उससे पूछे कौन? हम सब (मैं और केनेथ तथा दो-तीन अन्य मित्र) तो उससे बोलते तक नहीं थे. हमारी क्लास में मोटू की टक्कर का था लाला. जैसा नाम वैसा ही स्वरूप था उसका. पिताजी उसके ठेकेदार थे-उसी विभाग के जिसके मोटू के पिता मंत्री थे. मोटू और लाला में छनती भी बहुत थी और वही एक ऐसा इंसान था पूरी क्लास में जो मोटू की लात नहीं खाता था. हाँ यदा-कदा दोनों साथ बैठ कर खाना अवश्य खाते थे इंटरवल में. इधर जब से स्कूल खुला था, लाला आ नहीं रहा था. आज भाग्य से वह दिख गया. मोटू के मुकाबले लाला चतुर था. उसके दोस्त अनेक थे, वह किसी से मारपीट नहीं करता था और ना ही पैसों की झूठी शान दिखाता था. लाला की अंगरेजी कुछ वैसी ही थी, जैसी मेरी मैथ्स. सर ने एक दिन हम सबसे अनुवाद करने को कहा. लाला को वाक्य दिया गया ‘सूर्य गर्म होता है.’ लाला ने इसका अनुवाद किया ‘द सन इज होंट.’ बेचारा सर के लाख सिखाने पर भी किसी प्रकार हॉट ना कह पाया. हम लोग हँसते रहे. पर इंग्लिश सर और मैथ्स सर में यही अंतर था, उनको लाला पर गुस्सा नहीं आया, बल्कि उसे प्यार से समझाते रहे.
खैर मैंने केनेथ से कहा कि लाला से के द्वारा मोटू से पता करो मैथ्स सर कैसे हैं. थोड़ी देर के बाद लाला ने बताया कि मोटू कहा रहा है, ‘क्लास में खुद ही देख लेना कैसे हैं सर.’ अब तो बड़ा टेंशन हो गया दिमाग में. मैं सोचने लगा, ‘आज तो बचाव के लिए रानी भी नहीं है.’ फिर सोचा कोई बात नहीं ‘यदि सर पिटाई करने ही लगेंगे तो गायब हो जाऊंगा टर्रटर्र की मदद से.’ आज के इंटरवल के बीस मिनिट कुछ ज्यादा ही लगे. और दिनों तो लगता था, अभी तो शुरू ही हुआ था और इतनी जल्दी समाप्त भी हो गया! पर आज तो एक-एक पल भारी हो रहा था. एक ओर से मन कह रहा था कि आज का इंटरवल समाप्त ही ना हो! पर घंटी की टनटनाहट ने तंद्रा भंग की और हम सब चले क्लास की ओर. इंटरवल के बाद क्लास की ओर हम लोग ऐसे जाते थे जैसे कसाई के साथ बकरे जाते हैं. जबकि इंटरवल शुरू होने या छुट्टी की घंटी पर ऐसे भागते थे जैसे अस्तबल की ओर जाता घोड़ा.
क्लास में एक अजीब सा सन्नाटा था. पता नहीं था सर आएँगे कि नहीं. कुछ मिनिट के बाद मोटू क्लास से बाहर चला गया. बहुधा वह जाता था, मैथ्स सर का रजिस्टर आदि लाने. मेरे सीने में धक-धक इतनी तेज थी कि लगता था मानों तबला बज रहा हो अंदर! जैसी तेजी से मोटू गया था, उसी तेजी से लौट आया, मगर खाली हाथ. बड़ी तसल्ली हुई-यह देख कर कि आज सर ने मोटू को लिफ्ट नहीं दी. मगर ऐसा कुछ नहीं था. मैथ्स सर की जगह पर पी. टी. सर आ गए और बोले कि तुम लोग अपने बस्ते क्लास में छोड़कर बाहर मैदान में चलो. आज मैथ्स सर नहीं आयेंगे. बहुत कोशिश करने के बावजूद अधिकाँश बच्चों के मुंह पर मुस्कराहट आ ही गयी. बाहर मैदान में सर ने कुछ देर पी. टी. कराई और फिर हम लोगों को एक पेड़ की छाया में बैठा दिया. स्वयं चले गए स्कूल की ओर. उनके मुड़ते ही, सब बात करने लगे, ‘अबे, क्या हुआ होगा मैथ्स सर को?’ सब अपना अपना अनुमान लगा रहे थे. तभी मोटू जोर से बोल उठा, ‘इसमें कोई खुशी की बात नहीं है, मैथ्स सर का मुंह सूज कर कद्दू जैसा हो गया है और बहुत तकलीफ में हैं बेचारे. तुम लोग इस बात की खुशी मना रहे हो, एक बार ठीक हो कर आने दो सबकी पिटाई करवाऊंगा.’ मोटू की धमकी से हम लोग सहम से गए. पर फिर भी मन ही मन सभी प्रसन्न थे. सबसे अधिक प्रसन्न शायद मैं था-क्योंकि सबसे अधिक पिटाई मेरी होती थी! छुट्टी की घंटी के पहले सर आए और उन्होंने बताया कि फिलहाल एक हफ्ते तक मैथ्स सर नहीं आयेंगे. मेरा तो मन प्रसन्नता से भरपूर था.
जब मैथ्स सर आते थे तब ऐसा लगता था कि जैसे मैथ्स का पीरियड चंद मिनिटों में आ जाता था. पर प्रथम बार ऐसा हुआ कि मैथ्स टीचर छुट्टी पर थे और वह भी एक हफ्ते की-अब तो मैथ्स पीरियड आते आते पूरा दिन बीत जाता था. खैर वह हफ्ता बड़ी मस्ती में बीता. हम लोगों ने पी. टी. सर को पटा लिया और बजाय पी. टी. करने के उनसे मैथ्स पढ़ने लगे. सच में वह इतनी अच्छी तरह से समझाते थे कि जो बातें इतने साल कभी समझ में नहीं आई वह भी आसान लगने लगी. मैं सोचता था, ‘काश मैथ्स सर हमेशा के लिए छुट्टी में रहते और पी. टी. सर मैथ्स पढ़ाते!’ पर हर अच्छी चीज अनिश्चित काल के लिए नहीं होती.
उस सोमवार की सुबह जब मैं स्कूल के लिए तैयार हो रहा था तो मेरी बाईं आँख बुरी तरह फड़क रही थी. मेरा मन आशंकित था कि आज कुछ ना कुछ गड़बड़ अवश्य होगी. मैंने टर्रटर्र को बैग में रखा और चलते, चलते रानी को भी बालों में बैठा लिया. यह स्वाभाविक था कि जब रानी चलेगी तो साथ में झुण्ड तो जाएगा ही. स्कूल पहुँचते ही, मानों किसी अदृश्य इशारे रानी मेरे मन की बात समझ गई और सीधे अपने रोज वाले पेड़ पर जा बैठी. मैं रोज की भाँती क्लास की ओर जा रहा था. मैने देखा सामने साइकिल पर मैथ्स सर चले आ रहे हैं.

             मैथ्स सर साइकिल पर चले आ रहे थे.

उनका सामना ना हो, इसलिए मैं जल्दी से बरामदे में चढ़ गया और खंभे की आड़ से मैंने देखा कि मैथ्स सर तो एक हफ्ते में और तंदरुस्त लग रहे थे. मैंने मन में सोचा, ‘बेटा बिज्जी आज तो तू गया...’
कमाल यह हुआ कि उस दिन सारी कक्षाएँ ऐसा लगा कि फटाफट हो गईं, और तो और इंटरवल भी कुछ छोटा ही प्रतीत हुआ. क्लास में घुसने के पूर्व मैं ‘वाशरूम’ गया था, पर ना जाने क्यों मुझे लग रहा था कि सर के आने के पहले मैं एक बार और हो लूँ. मेरा मन इसी उहापोह में था कि सर आ गये. मैथ्स सर ना तो कोई फ़ालतू बात करते थे और ना ही उनसे कोई बोलता था. आते ही सबसे पहले हमेशा की तरह उन्होंने मुझे बुलाया और एक कागज दिया, जिसमे दो सवाल लिखे हुए थे. हमेशा की तरह उन्होंने मुझसे कहा कि ‘इनको बोर्ड पर लिखो और हल करो.’ भाग्यवश इस प्रकार के भाग के प्रश्न दो दिन पहले ही पी. टी. सर ने कराए थे. मेरा भाग्य अच्छा था कि मैं उनको बिना किसी दिक्कत के कर ले गया. वापस सीट पर जाते हुए मुझे और दिनों की भाँती डर नहीं लग रहा था. मेरे बाद और बच्चे बारी बारी से बोर्ड पर जाते रहे. फिर नंबर आया मोटू का. मोटू अपनी सीट से उठा, पहले उसने जोर से जम्हाई लेते हुए अपने दोनों हाथों को ऊपर की ओर खींचा, उसके बाद मस्त हाथी सा झूमता हुआ वह सर के निकट गया. सर ने एक पर्ची उसे पकड़ा दी और बोले, ‘इस प्रश्न को बोर्ड पर हल करो.’ मोटू को सहसा विशवास नहीं हुआ. साधारणतया वह उसे जो प्रश्न देते थे, उनका उत्तर भी उसी पर्ची में लिखा होता था-हम लोगों को साफ़ दिखता था की मोटू पर्ची से सवाल और जवाब दोनों बोर्ड पर उतार देता था. पर आज तो पर्ची में केवल प्रश्न ही लिखा हुआ था. मोटू ने एक बार पूछा, ‘सर इसे हल भी करना है?’
सर ने गुर्राते हुए कहा, ‘हाँ, अभी हल करके सारे क्लास को दिखाओ.’ मोटू को तो यह भी समझ में नहीं आ रहा था कि प्रश्न में लिखा क्या है. लिखते हुए बार-बार सर से पूछता. बहुत सोचा उसने, पर प्रश्न का उत्तर नहीं दे पाया. उस रोज मोटू प्रश्न को हल नहीं कर सका. पता नहीं सर को क्या हुआ उस दिन! अचानक खड़े हुए और जोर का एक जन्नाटेदार थप्पड़, मोटू की कनपटी पर दे मारा.


              मैथ्स सर ने मारा मोटू के थप्पड़

थप्पड़ पढ़ा नहीं कि मोटू चीखा पूरी ताकत से. उसकी चीख ऐसी थी जैसे कोई राक्षस गरजा हो. चीखते हुए कह रहा था, ‘मास्टर तू तो गया, तुझे तो जेल होगी आज.’ कुछ प्रलय की सी स्थिति हो गयी. ना जाने कहाँ से मोटू का सुरक्षा गार्ड और ड्राइवर दोनों लपक कर क्लास के अंदर आ गए और उसने सर को पकड़ लिया. पुलिस वालों की गिरफ्त में आये सर वैसे ही गिड़गिड़ा रहे थे, जैसे मैं गिड़गिड़ाता था. वाह री किस्मत-हमारे आगे शेर समान दहाड़ने वाले मैथ्स सर आज कैसे बकरे की भाँती मिमिया रहे थे, थरथरा रहे थे. मेरे बालों में रानी के परों की कुछ फड़फड़ाहट हो रही थी. शायद रानी इस सब शोरगुल, चीख, पुकार से परेशान थी! वह भी तो चुपचाप सारा तमाशा देख रही होगी! पुलिस वाले लगभग घसीटते हुए मैथ्स सर को प्रिंसिपल साहेब के कमरे में ले गए. हम लोग क्लास के दरवाजे पर खड़े उचक उचक कर देखने की चेष्ठा कर रहे थे, पर ना तो कुछ दिखा रहा था और ना ही सुनाई दे रहा था. बस उस लाइन की सारी क्लास के टीचर और बच्चे कौतुहल से उधर की ओर ही देखे जा रहे थे. काफी देर तक यह स्थिति बनी रही उसके बाद ऑफिस से बड़े बाबू क्लास में आए और उन्होंने कहा ‘तुम लोगों की आज छुट्टी.’ जाते समय बड़े बाबू अपने साथ वह मोटू को भी ले गए. सारा घटनाचक्र इतनी तेजी से घटा कि मुझे लगा मैं स्वप्न देख रहा हूँ.
दूसरे दिन इंग्लिश टीचर ने बताया कि स्कूल की कमिटी ने मैथ्स सर को नौकरी से निकाल दिया. सारे क्लास में क्या, सारे स्कूल में प्रसन्नता की लहर दौड़ रही थी. उनकी जगह अब मैथ्स की नई टीचर आ गयी थी. और हमारी खुशी तो सातवें आसमान में थी. नई टीचर बिना सजा दिए बहुत अच्छी तरह पढाती थीं.
मेरे जीवन की एक बड़ी समस्या समाप्त हुई.
कुछ ही दिनों बाद दशहरे की छुट्टी होने वाली थी. तभी खबर आई कि नाना जी कुछ अस्वस्थ हैं. छुट्टी आरंभ होने में तीन दिन बाकी थे कि हम लोगों का जाने का प्रोग्राम बन गया. जैसे टर्रटर्र और रानी को को अपने साथ मैं लाया था, उसी प्रकार उनको वापस भी ले गया.
नाना जी के घर पहुंचे तो वह तो थोड़ा ठीक हो चुके थे, कुर्सी पर बैठे हुए थे. उन्होंने बताया कि झपसट अपने गाँव गया गया था तीन दिन के लिए और उसका वहाँ एक्सीडेंट हो गया. जब से वह गया है टुकटुक खाना नहीं खा रहा है. मैंने जैसे ही सुना मैं किसी से बात किए बिना सीधा भागा टुकटुक को देखने. जाते ही पहले तो मैंने बालों से रानी को निकाल कर उड़ा दिया. अपना क्षेत्र वह भलीभांति जानती थी-और सीधे चली गयी अपने झुण्ड के साथ. फिर टर्रटर्र को भी बाहर रख दिया और वह फुदक चला पास ही एक पानी के सोते के पास. उसके बाद टुकटुक को मैंने खूब प्यार किया. मैंने देखा उसकी आँख में आंसू थे. उसके आगे मैंने कुछ चारा रखा तो उसने उसे सूंघा और फिर मुंह फेर लिया. मैंने बहुत मनाया उसे, पर लगता था वह कुछ भी खाने को तैयार नहीं था.


                टुकटुक की आंख में आंसू थे.

मैं टुकटुक की खुशामद में लगा हुआ था, बाहर कोई आ गया, मुझे पता ही नहीं चला. बाहर डॉक्टर साहेब आ चुके थे, टुकटुक को देखने. मुझे उन्होंने अस्तबल से बाहर कर दिया. कुछ क्षण बाद टुकटुक के हिनहिनाने से लगा कि शायद उसे इंजेक्शन लगाया गया था. डॉक्टर साहेब ने बताया कि टुकटुक बहुत बीमार है. उसे बहुत खराब पीलिया है. मैं बहुत दुखी था सुनकर कि मेरा सबसे अच्छा दोस्त बीमार है. पर मैं कर ही क्या सकता था!
सुबह मैं बहुत जल्दी उठ गया. उस समय सिर्फ नानी उठी हुई थी. मुझे देख कर बोली, ‘बड़ी जल्दी उठा गया आज तू!’ मैंने कहा ‘हाँ मुझे टुकटुक से मिलना है.’ ‘चल मैं भी चलती हूँ,’ नानी ने घुटनों पर जोर देकर उठते हुए कहा. और दिन जब मैं टुकटुक के दरवाजे पर पहुंचता तो वह अंदर से हिनहिना कर मेरा स्वागत करता था. पर आज कोई आवाज ही नहीं थी. मैंने बाहर से आवाज दी ‘टुकटुक’, पर कोई उत्तर नहीं आया. मुझे लगा जैसे मैं मैथ्स टीचर की डर से स्कूल वाले दिन देर से उठता हूँ, शायद वैसे ही डॉक्टर साहेब की डर से यह भी सो रहा है! मैने दरवाजे को धक्का देते हुए कहा, ‘टुकटुक डॉक्टर साहेब तो बहुत अच्छे होते हैं, डरता क्यों है!
नानी कहती थी, घोड़ा अगर जमीन पर बैठा हो तो इसका अर्थ है वह बीमार है. अरे यह क्या, टुकटुक तो जमीन पर लेटा हुआ था. मुझे पीछे रोक कर नानी गयी उसके पास. प्यार से आवाज दी उन्होंने, ‘टुकटुक बेटा उठो.’ कोई हरकत नहीं हुई. उन्होंने उसकी नाक के आगे हाथ लगया देखने को कि सांस चला रही है या नहीं. प्यार से उसके शरीर पर हाथ फेरते हुए नानी ने मुझसे कहा, ‘बेटा यह चला गया हम सबको छोड़कर.’ मुझे पूरी तरह तो समझ में नहीं आया पर इतना अंदाज अवश्य आ चुका था कि मेरा बेस्ट फ्रेंड अब कभी मुझे नहीं मिलेगा.   

           मेरा बेस्ट फ्रेंड हमेशा के लिए चला गया.

  

Friday, January 31, 2014

रानी का कमाल

स्कूल के पहले दिन ही मैथ्स क्लास में मार खाने और निकाल दिए जाने के बाद से मैं बेहद उदास था, परेशान भी था, कि आगे कैसे काम चलेगा. कठिनाईयां अनेक थीं. बच्चे की बात को कोई नहीं सुनता, ना कोई समझता है. सबको यही लगता है कि बहाने बना रहा है. भला बताओ मित्रों इन बड़े लोगों ने जब मैथ्स बनाई तो उस समय सोचना चाहिए था ना कि यदि किसी को ना समझ में आये तो क्या करना होगा! उधर मैथ्स सर की क्या कहूँ, छह अंको का प्रश्न दे दिया-अब अगर उनमे से मैने तीन को घटा दिया और तीन को जोड़ दिया तो इतना घनघोर अपराध हो गया कि मुझे मार कर क्लास के बाहर कर दिया.
घर आकर मेरा किसी कार्य में मन नहीं लगा. खाना भी नहीं खाया गया मेरे से. खाने के बाद पापा-ममी सब लोग आम खा रहे थे, पर मैं, ‘मन नहीं है’ कह कर अपने कमरे में चला गया. दोनों इतना मशगूल थे आम खाने में कि उन्होंने मेरे मुहं को एक बार देखा तक नहीं. वरना उनको शायद अनुमान लग जाता कि मैं किसी समस्या में हूँ. कमरे में आकर इसी ऊहापोह में था कि कल क्या होगा, तो इतने में फोन की घंटी बजी. चाचा का फोन था. इस दुनिया में नाना के बाद यदि कोई मुझे समझता था तो वे थे चाचा जी. मेरी आवाज से ही ना जाने उनको कैसे अनुमान लग गया कि मैं परेशान हूँ! मेरे बिना कुछ कहे, वे खुद ही बोले, ‘क्या बात है बेटे कुछ परेशानी है क्या?’
उत्तर में मुझे रोना आगया. मेरे आंसू तो चाचा किसी किसी कीमत पर नहीं देख सकते थे. लखनऊ के पास में ही एक कस्बा है बख्शी का तालाब, वे वहाँ पोस्टेड थे. बस हमारी बात अभी हुई भी नहीं थी कि तपाक से बोले, ‘तुम फोन रखो, मैं अभी आ रहा हूँ.’ मैं बिना किसी को बताए सीधा बिस्तर में घुस गया और चाचा की प्रतीक्षा करने लगा. मुश्किल से बीस मिनिट बीते होंगे कि चाचा की गाड़ी का हॉर्न सुनाई दिया. वे सीधा पहले मेरे पास आये. आते ही मुझे गोदी में उठा लिया और विस्तार से सारी बात जान ली. उसके बाद उन्होंने मैथ्स की होमवर्क कॉपी माँगी, और मेरे सारे गलत सवाल ठीक किये, मुझे समझाया, सिखाया कि जैसे जोड़-घटाना किया जाता है. मैं इतना बुध्धू भी नहीं था, सिर्फ मैथ्स टीचर के भय के कारण गलतियां करता था.
उस रात चाचा मेरे पास ही सोये और मुझमे एक नया आत्मविश्वास जगा गए कि कल से तुम मार नहीं खाओगे. पर कल जो मार खाई थी, उसका हिसाब तो चुकाना ही था मैंने. इसलिए दूसरे दिन स्कूल जाते समय जैसे ही रानी मेरे बालों में बैठी, मैं आगे बढ़ता रहा. मैं हजरतगंज से गुजर रहा था, मेरे बैग में था टर्रटर्र और बालों में थी रानी और करीब पचास फिट ऊपर उड़ रहा था कोई एक हजार बर्रों का झुण्ड. यदि किसी ने उनको देखा भी होगा तो यही सोचा होगा कि ‘छत्ता बनाने जा रही होंगी कहीं!’. स्कूल के अंदर भी किसी को पता ना चला. मैंने सोचा कि मैथ्स क्लास तो इंटरवल के बाद होती है, तब तक इनको अपने साथ क्यों रखूं! इसलिए रानी को निकाल कर उसी पेड़ की ओर उछाला जिस से कल कालू मोटा गिरा था. रानी इशारा समझ गयी और वे और उसके साथी पेड़ के तने के ऊपरी भाग से चिपक गए.
मैं क्लास जाने के लिए सड़क पार कर रहा था तो देखा मोटा आज लाल बत्ती वाली कार में आ रहा है. मेरे बिलकुल करीब आकर कार ने ऐसा चीं... करके ब्रेक मारा कि मैं उछल कर दो फुट आगे गया. मोटा कार से उतरा, उसके साथ एक बंदूकधारी पुलिस भी. आदतन, ‘क्यों बे देहाती’ कहते हुए वो मेरी ओर लपका. पर तभी उसके ड्राइवर ने पूछा ‘भैय्या, छुट्टी कितने बजे होगी?’ कालू मुड़ा जवाब देने और मैं ये जा, वो जा. रोज की तरह सामने से इंग्लिश सर आ रहे थे. उन्होंने अपना सामान मुझे पकड़ा दिया-वो सामान मेरे लिए सुरक्षा कवच का काम करता था, क्योंकि उसे लेकर जाने वाले को मोटा कभी नहीं तंग करता था, और खुद कभी हाथ भी नहीं लगता था सर के सामान को-उसकी बेइज्जती जो हो जाती. 
क्लास की सुरक्षित दीवारों के अंदर पहुँच कर मैने मन ही मन ऊपर वाले को धन्यवाद दिया, कि आज मोटे की लात से बच गए! कल की घटनाओं से मोटा कुछ डरा हुआ लग रहा था. उसकी सुरक्षा में आया हुआ वो तोंदू सिपाही, क्लास के दरवाजे पर खड़ा हम सबको घूरते हुए ऐसे मूंछें तरेर रहा हो मानों हमलोग कोई चोर उच्चक्के हों! खैर ज्यादा देर तक परेशान नहीं होना पड़ा, हमारे सर आ गए. उन्होंने आते ही पहले उस सिपाही को कहा कि ‘यहाँ क्लास के अंदर बच्चों की सुरक्षा कि जिम्मेदारी मेरी है, इसलिए आप वो उधर बेंच पर बैठ जाइए.’ वैसे भी उस सिपाही की हालत ऐसी नहीं थी कि घंटा-दो घंटा लगातार खडा रह पाता. वह खुशी से जाकर बेंच पर बैठ गया. मेरी सीट से वह बेंच दिख रही थी और मैने देखा कि कुछ देर तो वह खैनी आदि मसलता रहा फिर खैनी का अन्ता मुंह में दबा कर ऊंघने लगा. मेरे देखते ही देखते उसे गहरी नींद आ चुकी थी.
एक के बाद एक क्लास होती गयी. और फिर बज गई इंटरवल की घंटी. ऐसा लगा मानों क्लास में भूचाल आ गया हो. सब भागे क्लास के बाहर मैदान में. मोटा पीछे पीछे आ रहा था, कुछ हांफता हू चिल्ला रहा था, ‘आज मैथ्स सर के घर में मिट्टी हो गयी है इसलिए आज क्लास नहीं होगी.’ इस तरह के ऐलान करने की उसकी रोज की आदत थी. इसलिए किसी ने उसकी बात पर ध्यान नहीं दिया. सब लोग चले गए खेलने. आज तो मोटा भी मैदान में फुटबॉल खेल रहा था. दूर से ऐसा लग रहा था कि फुटबॉल के पीछे एक बड़ी फुटबॉल भाग रही हो! मै अपनी कल वाली बेंच पर बैठ कर खाना खाने लगा. मैने यह तय किया कि लड़कों के आने के पहले ही रानी को उठा कर बालों में रख लूंगा.
खाना खाने के बाद कुछ देर मैं यूं ही मैथ्स कॉपी के पन्ने पलटते रहा और सोच रहा था कि क्लास में आज ना जाने मेरी क्या गत बनाएगा मास्टर. सोचते सोचते एक कुटिल सी मुस्कान मेरे होंटों पर आई, कि आज रानी क्या गत बनाएगी उसकी! मैदान में रेफरी की सीटी बज चुकी थी कि गेम का समय समाप्त हो चुका है. मैं भी आहिस्ता से उठा और नीम के नीचे चला गया. रानी तुरंत मेरे बालों में आकर छिप गई, जैसे उसे पहले से मालूम था कि अब क्या करना है. साथ ही उसका पूरा झुण्ड भी पर फड़फड़ा रहा था, साथ चलने को तैयार. जैसे ही घंटी बजी, मैं औरों से थोड़ा पहले चल पड़ा क्लास की ओर. मेरे बैठते ही, कोई आठ-दस बर्र तो क्लास की दीवारों और खिड़कियों पर चिपक गई. बाकी सब क्लास के बाहर छत से चिपक कर बैठ गयी. लग रहा था जैसे आते हुए दुश्मन को देख कर सैनिक छिप कर घात लगाते हैं, कुछ वैसे ही रानी और उसकी फ़ौज भी घात लगा कर बैठ चुकी थी.
मैथ्स सर आये. अबसे पहले मेरा नाम पुकारा आज उन्होंने. कुछ क्षण को तो मुझे लगा कि आज फिर मार पड़ेगी! पर चाचा की बात याद क्रेट हुए मैंने हिम्मत नहीं छोड़ी और चल पड़ा सर की ओर कॉपी लेके. आधे रास्ते में था कि वो दहाड़े, ‘बैग भी साथ ले आते तो तुमको वापस नहीं जाना पड़ता!’ मैने उनकी बात अनसुनी करदी और कॉपी उनके आगे रख दी. आज तो कोई प्रश्न गलत था ही नहीं इसलिए मारने का तो प्रश्न ही नहीं था. कॉपी चेक कर उन्होंने तिरस्कार से मेरे आगे फेक दी और बोले, ‘ठीक है आज बच गए, लगता है किसी की मदद ली है तुमने!’ मैं अपनी सीट पर वापस आ गया. मेरे बाद सभी की कॉपी चेक हुई. मजे की बात यह कि मोटे की कॉपी सर ने अपने बैग से निकाली, चेक करने का नाटक किया और उसे प्यार से बुला कर वेरी गुड कहते हुए कॉपी उसे दे दी. मोटे का सिपाही बाहर दरवाजे पर खड़ा था. मैं सोच रहा था, अच्छा हुआ कि आज मुझे निकाला नहीं, वरना इस सिपाही के साथ खड़ा रहना पड़ता.
आज मास्टर जी ब्याज के सवाल करा रहे थे. अचानक एक प्रश्न लिखवाया और मुझे बोर्ड पर उसे हल करने को कहा. मारे डर के मुझे बोर्ड भी धुंधला दिख रहा था. हाथ काँप रहे थे. चौक हाथ से छूट जा रही थी. मेरे समझ के बाहर था यह प्रश्न. मैंने काफी देर कोशिश की, फिर उनसे कहा, ‘सर नहीं समझ में आ रहा है.’
सर अचानक खड़े हुए, अपनी बड़ी बड़ी लाल आँखों से गुस्से से मुझे घूरते हुए दहाड़े, ‘तुमको जब तक दो हाथ न पड़ें तुम्हारी समझ में कुछ नहीं आता.’ नजदीक आकर अभी हाथ उठाया ही था उन्होंने, कि अचानक जोर से दर्द से चीखे. हुआ यूँ की जैसे ही सर दहाड़े मैंने अपने बालों के बीच रानी के परों की हरकत महसूस की. यह शायद उसका इशारा था बाकी फ़ौज के लिए ‘सावधान, तैयार हो जाओ, हमला हो सकता है.’ और दूसरे ही क्षण सर की चीख सुनाई दी.
पहले तो तीन-चार ही बर्र उनके चेहरें पर चिपकी, बस उसके बाद तो बाकी सब भी आकर उनको काटने लगी. सर का बुरा हाल था.
                             सर दोनों हाथों से मुंह छिपा रहे थे.

हाथों से मुंह छिपा रहे थे तो दोनों हाथों में भी काट लिया. सब बच्चे घबरा गए थे यह देख कर. पीछे वाला दरवाजा खुला था, सब भागे उधर से ही. मैं भी सबके पीछे भागा. मोटू को उसके सुरक्षा गार्ड ने जल्दी से बाहर निकाला और सीधे भागा प्रिंसिपल साहेब के कमरे की ओर. हम सब बाहर लॉन में खड़े हो गए. हम सबको देख आकर बाकी क्लास के टीचर भी निकल आये और पूछने लगे ‘क्या हुआ?’ उनको बताया तो वे लोग डरते डरते गए क्लास की ओर. उधर मोटू के सिपाही ने प्रिंसिपल सर को बता दिया, साथ ही मोटू के घर फोन कर दिया कि फौरन गाड़ी भेजो. प्रिंसिपल सर, साथ में दफ्तरी, बड़े बाबू, चपरासी आदि की फ़ौज दौड़ी हमारी क्लास की ओर. मैंने दूर से देखा, मैथ्स सर बेहोश से पड़े थे अपनी कुर्सी पर, उनका थोबडा देख कर लग रहा था जैसे कहीं से बुरी तरह पिट कर आये हों. जगह जगह लाल लाल फूल आया था.



                                     सर का चेहरा बुरी तरह फूल चुका था.

देख कर बड़ा दुःख हुआ, पर अंदर ही अंदर खुशी भी हुई कि कमसे कम आज का दिन मार से बचे!
पूरा पीरियड तो इसी में चला गया, और घंटी बजी-हम सब पहले से ही तैयार थे, भागने को. जैसे ही मैं बाहर आया क्लास के मेरे पीछे पीछे सारी की सारी बर्र भी आ गई. हम सब दोस्त आज की घटना पर बात करते हुए चल पड़े साइकिल स्टैंड की ओर. मोटू तो पहले ही जा चुका था अपने गार्ड के साथ.
केनेथ मुझसे बोला, ‘आज बच गए दोस्त वरना मैथ्स सर तो शायद आज तुम्हारी चटनी ही बना देते!’ उसको बताने को मैने कह दिया, ‘हाँ यार आज तो बच ही गए.’ पर मैं जानता था कि अब मैथ्स सर कभी मार नहीं पाएंगे.
उस दिन मैं युद्ध जीत कर प्रसन्न मुद्रा में घर लौटे सिपाही की भाँती घर में घुसा. ममी भी समझ गई कि आज कुछ अच्छा हुआ होगा....      

Saturday, January 18, 2014

खुल गया स्कूल

स्कूल खुलने के एक दिन पहले डर के मारे नींद ही नहीं आती थी-बस यही चिंता होती थी कि कल मैथ्स टीचर की पिटाई और कालू मोटे की धमकी से कैसे बचा जाएगा! पूरी रात यही मनाता था कि ‘भगवान उन दोनों को बीमार कर दो!’ पर कहाँ, ऐसा कुछ नहीं होता था-उलटे मेरी ही ऑंखें नींद से सूज जाती थीं. पर इस बार ऐसा कुछ नहीं था. नींद आ भी रही थी, पर साथ ही यह भी विचार मन में था कि कैसे सुबह हो और कैसे मैं स्कूल जाऊं! और बार तो ममी उठा उठा कर तंग हो जाती थीं, पर इस बार तो मैं सबसे पहले उठ चुका था. नहा-धो कर फटाफट तैयार हुआ और आ बैठा नाश्ते की मेज पर. बिना ममी की खुशामद के अपने मन से नाश्ता किया और भाग कर गया अपने दोस्त टर्रटर्र को देखने. पहले उसे जूते के अंदर देखा-वहाँ तो वह था ही नहीं. दिल धक से रह गया-कहीं कोई बिल्ली तो नहीं खा गई उसे!

पर मेरा भय अकारण निकला. टर्रटर्र तो पहले ही से मेरे स्कूल बैग में बैठा हुआ था. मैने उसे बैग की बाहर वाली जेब से निकाल कर उसे अंदर वाली जेब में रख दिया. बाहर वाली जेब में ममी टिफिन रखतीं थीं और मेढक देख कर वह उसे फिकवा देतीं.

मैने सोचा ‘आज सिर्फ टर्रटर्र को ले जाता हूँ, तथा आवश्यकतानुसार रानी को बाद में ले जाऊँगा.’ बात यह थी कि मैं नहीं जानता था कि पहले दिन स्कूल में क्या-क्या होगा! मैं बैग को अपनी पीठ में रखे, साईकिल को एक हाथ से पकड़े जा रहा था. जैसे ही नीम के नीचे से निकला, रानी झट से मेरे बालों में बैठ गयी. मैने हलके से उसे उँगलियों से पकड़ हवा में उड़ा दिया. मेरा इशारा रानी तुरंत समझ गयी और वापस चली गयी अपने छत्ते में.

स्कूल में साईकिल स्टैंड में खड़ी कर रहा था कि मेरा दोस्त केनेथ भी आगया. हम दोनों में बहुत छनती थी. हम दोनों स्टैंड से अपनी छुट्टियों की बातें बताते हुए क्लास की ओर चल पड़े. सामने मैंने देखा दूर से कालू मोटा आ रहा था. मैंने मौक़ा पाकर टर्रटर्र को अपनी कमीज की जेब में रख लिया. केनेथ बता रहा था कि इस बार छुट्टी में कहाँ-कहाँ गए. पर अचानक अपने बगल में मुझे न पाकर वह चौंका-पीछे मुड़ कर देखा, आवाजें दीं पर मैं न दिखा. इसी बीच कालू सामने आ गया और साईकिल चलाते हुए एक लात उसने मारी केनेथ की टांग में और बोला, ‘किसे आवाज दे रहा है बे?’ केनेथ ने सुबह, सुबह झगड़ा करना उचित न समझा. और चुपचाप क्लास की ओर चलता गया. मैने सोचा यह सबसे अच्छा समय है कालू को झटका देने का.

मैं उसके पीछे से गया और कस कर एक धौल जमाई उसकी पीठ पर. पहले तो कालू चिल्लाया, ‘केनेथ के बच्चे तुझे देख लूँगा.’ पर जब उसने पलट कर देखा तो केनेथ तो आस-पास में था ही नहीं. उसका माथा ठनका. उसे और डराने के लिए मैंने उसके सामने उसकी साईकिल के पिछले पहिए की हवा निकाल दी. कुछ डर तथा कुछ विस्मय से वह चुपचाप क्लास की ओर चल पड़ा. मैं भी उसके साथ-साथ गया पर बरामदे के एक कोने में मौक़ा पाकर मैने टर्रटर्र को पैंट की जेब में डाल लिया. सामने से इंग्लिश के सर आ रहे थे. उनसे गुड मॉर्निंग कहा उन्होंने अपना सामान मुझे पकड़ा दिया और बोले इसे क्लास में ले चलो, मैं अभी आया. यह तो बहुत अच्छा हुआ, क्योंकि अब ना तो केनेथ और ना ही कालू मेरे ऊपर शक कर सकते थे,

घंटी बजने में दो-तीन मिनिट थे. मैंने सर का सामान मेज पर रखा और अपनी सीट पर जा बैठा. उस समय मेरे चेहरे पर शैतानी वाली एक मुस्कुराहट अवश्य थी, पर मैं जानता था कि उसे कोई समझ नहीं पायेगा. एक बात अच्छी थी कि मेरी सीट दूसरी पंक्ति में सबसे किनारे थी. इसलिए जब मैंने टर्रटर्र को पैंट की जेब से निकाल कर बैग में डाला तो कोई देख न सका. सर ने तो पहले ही दिन छुट्टी में कहाँ गए, क्या किया आदि बातों पर लेख लिखने को दे दिया. बोले कि अभी क्लास में पूरा करो. करता क्या न मारता, लिखना चालू किया. पहले सोचा कि यदि टुकटुक की बातें लिखीं तो सर खिल्ली उड़ाएंगे, पर मैने टुकटुक के साथ की हवाई यात्राओं के बारे में लिख ही मारा.

घंटी बज गई, दूसरी क्लास में जा रहे थे. कालू मोटे को तो बस मानों घंटी की प्रतीक्षा थी. बाहर आते ही उसने एक मुक्का जोर से केनेथ की पीठ पर मारा और बोला, ‘क्यों बे सुबह सुबह मेरी पीठ में क्यों मारा तूने?’ अब यह तो सरासर ज्यादती थी. हम सब दोस्त एक साथ कहने लगे यह गलत बात है, पर कालू तो कालू था. और डराने को बोला आज छुट्टी के समय तुमको देख लूंगा. केनेथ बेचारे की तो हालत खराब थी. पत्ते की भांति काँप रहा था थरथर और उसका रंग सफेद पड़ गया था.

आज तो कुछ करना ही पड़ेगा इस कालू का-मैं सोच रहा था. चार पीरियड समाप्त हुए जैसे तैसे और फिर घंटी बजी इंटरवल की. सब भागे मैदान की ओर. आज कालू, रोज की भांति फुटबॉल खलने नहीं गया बल्कि असेम्बली के सामने पुराने नीम के पेड़ के तने के दो भागों के बीच जमीन से कोई चार फिट की ऊँचाई पर बैठ गया. किसी सोच में डूबा हुआ था. खैर मुझे क्या. मैं तो उससे बात तक नहीं करता था. मैं कुछ दूर किनारे एक बेंच पर बैठा टिफिन खा रहा था. बेचारा टर्रटर्र भूखा होगा, इस क्या खिलाऊँ मैं सोच रहा था. मैने अपना टिफिन बैग में रखा और अंदर हाथ डाला टर्रटर्र को देखने के लिए, पर वह फुर्ती से सरक कर मेरी हथेली में आ बैठा. यह उसका इशारा था कि मुझे अपने पास रखो. मैंने इधर-उधर देखा, कोई देख नहीं रहा था और चुप्पे से उसे अपनी कमीज की जेब में डाल लिया. फिर बस्ते को वहीं छोड़कर मैं जा पहुंचा कालू के पीछे. सुस्त मोटा ऊंघ रहा था. लगता था शायद उसे नींद आ रही थी. मैने तय किया यह सर्वोत्तम मौक़ा है कालू को सबक सिखाने का. मैने पीछे से पूरा जोर लगा कर एक जोर का धक्का मारा कालू को. बेचारा मुंह के बल औंधा गिरा जमीन में. उसका मिट्टी और खून में सना मुंह देखने लायक था.

पहले तो वह आदतन चिल्लाया, ‘कौन है बे?’ पर दूर दूर तक उसे कोई न दिखा. तब शायद वह कुछ डर गया और लगा जोर जोर से रोने. दूर खड़े साइकिल स्टैंड के गार्ड ने शायद उसे देख लिया और भाग कर आया. गार्ड ने भी आस-पास सब ओर देखा, पर वहाँ कोई नहीं था. उसने कालू को समझाया, ‘भैय्या यहाँ कोई नहीं है, आपको नींद आ गयी होगी और आप गिर गए.’

कालू ने गुस्से से उसको भी एक लात मारी और बोला, ‘मैं नहीं सो रहा था और मुझे अच्छी तरह याद है कि किसी ने पीछे से धक्का मारा था.’ तब तक इंटरवल समाप्त होने का समय था, और वहाँ बहुत से बच्चे एकत्रित हो चुके थे. इस बीच मैंने मौका पाकर टर्रटर्र को जेब से बैग में डाल लिया था और मैं भी उसी भीड़ में खड़ा तमाशा देख रहा था. हर बच्चा अपना अपना अनुमान लगा रहा था कि क्या हुआ होगा! तभी बड़ी क्लास का एक लड़का बोला, ‘मुझे भी एक दिन किसी ने धक्का मारा था, जबकि मैं अकेला था. शायद यहाँ कोई भूत-वूत का चक्कर है.’

बस भूत शब्द सूना नहीं कि सब बच्चे भागे वहाँ से, साथ में कालू मोटा भी हाँफते हाँफते भाग रहा था. घंटी भी बज गयी और सबसे कठिन क्लास का सामना करने का समय आ चुका था. वो थी मैथ्स की क्लास. मैंने अपने आप को समझाया कि डर की क्या बात है. होमवर्क तो पूरा है. बस इसी हिम्मत से बैठ गया क्लास में. सर आए, बड़े खड़ूस टाईप सर थे. बस आए और बिना कुछ कहे गुर्राए ‘अपनी अपनी मैथ्स की कॉपी यहाँ जमा कर दो.’ हम लोग एक पंक्ति में जाकर कॉपी सर की मेज में रखते गए. उन्होंने किसी को देखा तक नहीं. बस कालू को देख कर मुस्कुराए, क्योंकि उसको वह घर पर जाकर ट्यूशन पढ़ाते थे. कालू भी उनको देख कर मुस्कुराया, पर होंठ सूजे थे इसलिए ठीक से मुस्कुरा नहीं पाया.

फिर सर ने बोर्ड पर चार प्रश्न लिख दिए ब्याज के. और बोले इनको हल करो और खुद लग गए कॉपी जांचने में. मेरी कॉपी उनके सामने खुली हुई थी. कुछ देर तक तो सही सही निशान लगाते गए और उसके बाद अचानक दहाड़े, ‘जोशी...इधर आओ.’ मैं डरते डरते वहाँ पहुंचा. ‘यह क्या किया है?’ जोर से चिल्लाये. सारा क्लास थर थर काँप रहा था, एक कालू को छोड़कर. और बार तो मैं डर के मारे कुछ सोच भी नहीं पता था, पर आज हिम्मत करके मैंने सोचा, ‘कालू को नहीं छोडूंगा.’ तभी एक जोर का झापड़ पड़ा मेरी कनपटी पर और मेरी कॉपी उन्होंने फेकी दरवाजे के बाहर. फिर चिल्लाये ‘अपना बस्ता उठाओ और बाहर हो जाओ मेरी क्लास से.’

मारता क्या ना करता क्लास के बाहर खड़ा में कुछ देर तक रोता रहा. फिर मैं थोड़ा एक ओर को आ गया और मैने टर्रटर्र को कमीज की जेब में डाल लिया. बस मैं और मेरा बस्ता दोनों हो गए गायब. अब सारी डर दूर हो चुकी थी और मैं तेजी से गया साईकिल स्टैंड की ओर. पर वहाँ तो चेन लगी थी सब साइकिलों पर, जिसमे ताला लगा हुआ था. स्टैंड वाला ऊंघ रहा था. मैंने चुपके से चाभी उठा ली और बिना आवाज किये ताला और चेन खोल डाले. मेरी साइकिल सबसे किनारे थी, इसलिए मुझे कोई दिक्कत नहीं हुई उसे निकलने में. चेन और ताला मैने वापस उसी प्रकार चुपके से लगा दिया. बस उसके बाद मैं फुर्र से उड़ चला. मुझे ध्यान ही नहीं रहा कि मैं पूरे रास्ते अदृश्य ही रहा. याद आया घर के फाटक पर जाकर. किसी प्रकार साइकिल अंदर की और टर्रटर्र को वापस डाला बैग में और घर की घंटी बजाई.

अब पहला काम तो यह करना था कि अपने से किसी बड़े से मैथ्स में क्या गलती की थी वह समझना और दूसरा काम था, कल को मैथ्स सर से निबटना. जो काफी खतरनाक काम था. पर मैंने आज तय कर लिया था कि या तो उनको पाठ पढ़ाऊंगा वरना स्कूल छोड़ दूँगा.

यह सब कैसे होगा यह तो आप लोग अगली कथा में ही पढ़ सकेंगे, कुछ दिनों बाद.
     


  

Wednesday, January 8, 2014

तीसरी दोस्त, रानी (बर्र) से मुलाक़ात

टुकटुक ने तो मेरी सारी परेशानी लगता था हर ली थी! नाना जी के घर से जाने के एक दिन पूर्व मैं लगभग सारा समय टुकटुक के साथ ही था. इस बीच टर्रटर्र भी हमारे साथ ही था. मैं अस्तबल में खड़ा टुकटुक की गर्दन सहला रहा था. अचानक मैंने देखा टुकटुक के लिए घास का बंडल लिए झपसट आ रहा है. मैंने जल्दी से टर्रटर्र को अपनी कमीज की जेब में रख लिया. झपसट आया और बिलकुल मेरे बगल में खड़ा होकर टुकटुक के आगे चारा डालने लगा. उसकी हरकतों से लगा कि वो मुझे नहीं देख पा रहा. फिर भी पक्का करने के लिए मैने उसके सर पर पीछे टीप मारी. उसने पलट कर देखा, और अपने आप से बोला, ‘ना जाने कौन था!’ मैंने एक टीप और मारी तो इधर-उधर देखते हुए जरा जोर से बोला, ‘कौन है यहाँ?’ पर उसे कोई नहीं दिखा. शायद वह डर गया था और चुपचाप से वहाँ से सरक लिया. अब तो मैं आश्वस्त हो चुका था कि जैसे ही टर्रटर्र कमीज की जेब में जाता है मैं मिस्टर इंडिया की भाँती गायब हो जाता हूँ.


                                           टर्रटर्र को कमीज की जेब में रखते ही मैं गायब हो जाता हूँ

मारे प्रसन्नता के मैं अपनी मुस्कुराहट को रोकने में नाकाम रहा. पर तभी मुझे लगा कि मेरी कमीज के अंदर से कोई आवाज आ रही है. गौर से सुना तो टर्रटर्र बोल रहा था-वह भी मेढक की भाँती नहीं बल्कि इंसान की भाँती. वह कह रहा था ‘आज खाने के बाद चलना हमारी तीसरी दोस्त रानी  से मिलने.’ यह तो गजब हो गया-बोलने वाला मेढक! मैने सोचा, यदि मैंने यह सब बात किसी को बताई तो लोग सोचेंगे ‘पागल हो गया है!’ इसलिए मैंने जल्दी से गर्दन हिला कर टर्रटर्र को कमीज की जेब से निकाल कर पैंट की जेब में रख लिया और अस्तबल से बाहर आ गया. बाहर नाना जी खड़े थे. मुझे देखते ही बोले, ‘वहाँ क्या कर रहे थे, अस्तबल में?’ मैने डरते डरते कहा, ‘कुछ नहीं टुकटुक का खाना देख रहा था.’ नाना जी तुरंत आदेशात्मक स्वर में बोले, ‘अब जाकर अपना खाना भी खा लो.’ 
भूख भी लगी थी और समय भी हो चुका था. उससे बड़ी बात यह थी कि टर्रटर्र ने कहा था कि खाने के बाद तीसरी दोस्त से मिलेंगे. अंदर कमरे में जाकर मैने टर्रटर्र को उसकी सबसे सुरक्षित जगह मेरे जूते के भीतर बैठने के लिए छोड़ दिया. मेरे मन में एक ही प्रश्न था अब, ‘कल टर्रटर्र को ले कैसे जाऊंगा?’ पैंट की जेब में रखना कठिन था. कोट को काठगोदाम आने के साथ ही उतर जाना था. कमीज की जेब में रखने का प्रश्न ही नहीं था. इसलिए मैने तय किया कि यात्रा के दौरान वह मेरे पिठ्ठू की साइड की जेब में रहेगा. खाना खाने के बाद उस दिन लोग उठ ही नहीं रहे थे. मुझे लगा कि यदि यह लोग आराम करने नहीं गए तो हमारा प्लान फेल हो जाएगा!
खैर थोड़ा देर से सही पर सब लोग जब आराम करने चले गए तो मैंने टर्रटर्र को डाला कमीज की जेब में और चल पड़ा टुकटुक के पास. वाह, रास्ते में नानी आ रही थी और उसने मुझे देखा ही नहीं-क्योंकि मैं उसे दिखा ही नहीं. ‘यह तो बड़े काम की चीज मिल गयी मुझे’-मैने सोचा! नित्य की भांति टुकटुक की पीठ पर मैं बैठा तो वह अपने स्थान से हिला तक नहीं. मैने उसकी गर्दन थपथपाई कि चलो भाई जल्दी. पर नहीं वह नहीं बढ़ा. मैने उसकी रास बांधी और हाथ से पकड़ कर बाहर ले आया. तब वह मेरे साथ कुत्ते की तरह चलने लगा. असल में तीसरी फ्रेंड तो रहती थी घर के एकदम पास एक मंदिर के बरामदे की छत में. इसीलिये टुकटुक मुझे बैठा नहीं रहा था. मंदिर के पास पहुँच कर टुकटुक ने एक खास ढंग से हिनहिनाया. भन्न की आवाज से मैं चौंका और देखा कि बर्रों का एक खतरनाक झुण्ड हमारी ओर आरहा है. मैं तो दोनों हाथों से सर ढक कर भागा घर की ओर... तभी पीछे से टुकटुक ने मेरे लिए वही पुरानी भर्र...र्र... वाली आवाज निकाली. पलट कर देखा तो टुकटुक की नाक पर एक चमकदार बर्र बैठी हुई थी. एकदम सुनहरे रंग की थी. उसकी बड़ी बड़ी आँखें तो मैं देखता ही रह गया. उस बर्र के साथ ही पूरा झुण्ड टुकटुक के सर के ऊपर भनभना रहा था. जैसे ही मैं नजदीक गया वह टर्रटर्र की भाँती उड़ कर मेरे सिर के ऊपर बालों के बीच आ बैठी और वह पूरा झुण्ड मेरे ऊपर चक्कर काट रहा था. टर्रटर्र इस समय मेरी पैंट की जेब में था. पड़ोस के कुछ शैतान लड़के टुकटुक को घेरने की तैय्यारी से आ रहे थे और छोटे पत्थर मार कर मुझे डरा रहे थे. उनमे से एक ने मुझे पीछे से पकड़ लिया. पर दूसरे ही क्षण वह दर्द से चीखा और चिल्लाते हुए भागा, ‘भागो यहाँ बर्र का छत्ता है पूरा.’ सारे लड़के भाग गए और हमने चैन की सांस ली.
अब मुझे यह समझ में आया कि जिस जगह यह बड़ी वाली बर्र जाती है, वहीं उसका झुण्ड भी जाता है और जिसके ऊपर वह बैठती है उसकी रक्षा पूरा झुण्ड करता है, क्योंकि उनको अपनी रानी की रक्षा करनी होती है. मुझे एक दिन नानी ने बताया था कि बर्रों और मधुमक्खियों के हर झुण्ड की एक रानी होती है और पूरा झुण्ड उसकी आज्ञा मानता है. इस समय जो बर्र मेरे बालों में बैठी हुई थी वह इस झुण्ड की रानी थी. यह बात तो समझ में आई, परन्तु समस्या फिर वही थी कि इस रानी और इसके झुण्ड को मैं ले कैसे जाऊंगा? मैने देखा जब मैं रानी (बर्र) को अपने बालों में छिपा कर घर के अंदर ले गया तो बाकी सब घर भर में इधर उधर दीवारों से चिपक गयीं. लगता था मानों वे सब मेरी कमांडो हों!


                                  रानी मेरी कमांडो

मेरे सर से फुर्र से उड़ कर रानी ने घर के बाहर एक छज्जे के नीचे स्थान ढूंढ लिया और वहाँ जा बैठी और उसे देखते ही बाकी सब ने मिलकर चुटकियों में वहाँ अपना छत्ता बना डाला. रानी तो वहाँ बैठ गयी, पर उसे बुलाने के लिए क्या करना होगा सोचते सोचते मुझे ना जाने कब नींद आ गयी. माँ ने उठाया, ‘आज खाना नहीं खाना है?’ तब देखा रात के नौ बज चुके थे. पहले जाकर जूते के अंदर टर्रटर्र को देखा. हजरत आराम कर रहे थे. मुझे देख और अंदर घुस गया और बोला, ‘इस समय बाहर नहीं जाऊंगा, बहुत ठण्ड है.’ मुस्कुराते हुए मैंने जूता वहीं रख दिया. फिर हाथ धोने के लिए बाहर गया तो देखा रानी और उसका पूरा कुनबा अपने छत्ते में सो रहा है.
खाना खाकर जब सोने आया तो नींद मानों गायब हो चुकी थी. मैंने यह तय किया कि रानी मेरे बालों में छिपी रहेगी और उसके साथी कार के ऊपर उड़ते हुए आ जायेंगे. टर्रटर्र तो मेरे पिट्ठू की जेब में जाने ही वाला था. सुबह काफी भगदड़ रही, सामान पैक हुआ, हम लोग तैयार हुए. फिर नाश्ते के बाद चलने का समय आ गया. और बार की भाँती इस बार मैं उदास नहीं था, क्योंकि इस बार मेरे साथ मेरे विचित्र दोस्त भी चल रहे थे. मुझे अब स्कूल में या खेल के मैदान में किसी का भय नहीं था. मन में एक अजीब सी उमंग और उत्साह था. कार की छत में भी सामान बांधा गया. जब हमारे बैठने का समय आया उस समय मैं सोच रहा था कि रानी को बुलाऊंगा कैसे? सबसे मैं यह कह कर भागा कि एक बार टुकटुक से बाय कर आऊँ. सबने जाने दिया, क्योंकि सब जानते थे कि मैं उसे कितना प्यार करता था और वह मुझे. पर यह सीक्रेट कोई नहीं जानता था कि मेरा बेस्ट फ्रेंड भी था टुकटुक. उसके अस्तबल में घुसने के पहले ही रानी स्वयं आकर बैठ गयी मेरे बालों में. मानो टुकटुक ने उसे पहले ही एस एम् एस कर दिया हो!


                                     बाय टुकटुक 

चलते समय मैने देखा टुकटुक की आँख से मोटे मोटे आंसू बह रहे थे. मैं अपने आंसू भी न रोक सका. आस्तीन से आंखे पोछते हुए मैं कार में जा बैठा. मुझे ध्यान ही नहीं रहा कि रानी के साथी कहाँ होगे? जैसे ही याद आई मैंने खिड़की से गर्दन निकाल कर देखा कि वे सब बहुत ऊंचाई पर कार के ऊपर उड़ रहे थे. जैसे ही कार चली वे सब छत पर रखे सामान से चिपक कर बैठ गए.
काठगोदाम पहुँच कर हमारे डब्बे की छत पर रानी के साथियों ने कब्जा जमा लिया और हम सब आराम से जा पहुंचे लखनऊ. घर में तो कोई दिक्कत ही नहीं थी. सामने आहाते में बड़ा सा नीम का पेड़ था. हमारा सामान तक अंदर ना सका था कि रानी और उसके साथी नीम पर छत्ता बना चुके थे.
अब बस देरी थी स्कूल खुलने की. कुछ होमवर्क बाकी था, मैथ्स का. जो दो दिन बचे थे छुट्टी के उसमे उसीको पूरा करने में लगा रहा. हाँ बीच बीच में टर्रटर्र को देख लेता था. वह कमरे के मच्छरों का सफाया करने में जुटा हुआ था-इसलिए मैं निश्चिन्त था कि उसे कुछ नहीं होगा!
स्कूल की बातें कल बताऊंगा-अभी जरा बर्रों को देख आऊँ. तब तक के लिए बाय.

  

Monday, January 6, 2014

टुकटुक के दोस्त

टुकटुक से मेरी दोस्ती बढ़ती जा रही थी. बेचारा बोल तो नहीं सकता था, पर बहुत कुछ बताना चाहता था. मूक प्राणी अपनी बात बताए भी तो कैसे? दोपहर में दो से चार बजे के बीच जब सब सो रहे होते, उस समय टुकटुक मुझे लेकर दूर-दूर सैर कराता, तो कभी हवाई यात्रा कराता. झपसट की अब आवश्यकता ही नहीं पड़ती थी, क्योंकि अब नाना जी भी आश्वस्त हो चुके थे कि मैं अच्छी घुड़सवारी कर सकता हूँ.
बड़ी प्रसन्नता से दिन व्यतीत हो रहे थे, पर टुकटुक से बिछड़ने का समय निकट आ रहा था. गर्मी की छुट्टियाँ समाप्ति पर थीं, स्कूल खुलने का समय निकट आ चुका था और मुझे वापस जाना था अपने शहर लखनऊ, जहां पापा रहते थे. स्कूल तो मुझे बहुत अच्छा लगता था, पर दो चीजों से मैं बेहद डरता था. एक तो थे मैथ्स के सर. पढ़ाते कम थे पिटाई ज्यादा करते थे. उनके क्लास की घंटी बजी नहीं कि मेरे जैसे अनेक बच्चे थर-थर कांपने लगते, किसी के पेट में अचानक दर्द हो जाता तो किसी को चक्कर आने लगता! उनकी क्लास भी होती थी ठीक इंटरवल के बाद. मैं अक्सर सोचता कि ‘यह मुआ इंटरवल छुट्टी के समय क्यों नहीं होता-आराम से कुछ खेलो, कुछ खाओ और जब छुट्टी की घंटी बजे तो घर को जाओ. कोई चक्कर ही न हो मैथ्स का.’ पर सब घर पर कहते मैथ्स के बिना जीवन में कुछ कर ही नहीं सकते! पता नहीं ये जीवन-वीवन क्या होता है, मुझे तो बस ये ही मालूम था कि मैथ्स क्लास में जाओ और मार खाके आओ. दूसरा था हमारा सहपाठी, कालू मोटा. नाम तो उसका कभी याद नहीं रहा. पर जैसा रूप था वैसा ही उसका टीचरों का दिया हुआ नाम था. स्वभाव से उग्र वह किसी को भी बिना बात पीट देता. उसके पिताजी थे कोई राजनेता सो उससे सब टीचर भी डरते थे.
मैं रोज मनाता कि ‘आज कालू का सामना न हो, या आज वो बीमार पड़ जाए!’ पर कहाँ वह तो भैसे की तरह खाता और कभी बीमार ही नहीं पड़ता था.
छुट्टी समाप्त होने के एक दिन पहले मैं इन्ही दो लोगों से सामना होने के डर से बेहद परेशान था. बार-बार माँ से कहता कुछ दिन और रुकने दो यहाँ. पर कौन सुनता है बच्चों की बात. आखिर मुझे अपने ‘बेस्ट फ्रेंड’ की शरण लेनी पड़ी. दिन में सब सो रहे थे. टुकटुक अपने अस्तबल में खड़ा घास खाने में मग्न था. मुझे आता देख उसकी आँखों में अजीब सी चमक आ गयी. उसने गर्दन हिला कर दोनों होंट मिलाकर मुंह से भुर्र..र्र..र्र. की आवाज निकाली. जी हाँ, उसका यही तरीका था मुझसे बात करने का. मेरी सूजी आँखें देख शायद वो समझ गया कि कुछ परेशानी है. मैं उसके सामने जा खड़ा हुआ और टुकटुक प्यार से अपना माथा मेरी छाती पर रगड़ने लगा. मैने जैसे ही अपने छोटे से हाथों से उसके गाल पकड़े मुझे रोना आ गया. टुकटुक ने अपना मुंह मेरे गाल से सटा दिया, उसकी धौंकनी जैसी सांस मानों मुझसे कह रही थी, ‘उड़ेल दे बिज्जी अपना सब दुःख, मत रख अपने अंदर कोई भी बात.’ बस मैंने उसका इशारा समझ लिया और अपने टीचर और कालू की सब बातें विस्तार से बता दी टुकटुक को. मैने देखा जैसे ही मेरी बात पूरी हुई, टुकटुक एक कदम पीछे हटा और उसने अपने पीछे के दोनों पैरों को झुकाया. यह उसका इशारा होता था, कि मेरी पीठ पर बैठो. अस्तबल में खड़े टुकटुक की पीठ पर जीन, रकाबी, रास कुछ भी नहीं लगी होती थी. पर वो तो मेरा पक्का दोस्त बन चुका था और मुझे उन सबकी आवश्यकता ही नहीं थी. मैं जब उसकी पीठ पर बैठा होता तो वह ऐसे संभल कर चलता कि मुझे तनिक भी झटका न लगे.
मैं उचक कर उसकी पीठ पर जा बैठा. मेरे बैठते ही टुकटुक बड़ी सफाई से झुकते हुए मेरे समेत अस्तबल के दरवाजे के पार हो गया. वह मुझे लेकर आज एक नए रास्ते पर जा रहा था. यह रास्ता घाटी की ओर जाता था. मैं उसकी गर्दन से लिपटा हुआ था और टुकटुक धीरे धीरे नीचे उतर रहा था, ताकि मेरे गिरने का भय ना हो. ढलान तेज थी. साथ ही रास्ते में रोड़ी भी बहुत थी. टुकटुक बीच बीच में फिसल जा रहा था, पर लगता था मानों उसने स्केट पहन रखे हों-जब भी फिसलता आगे के दो पैर थोड़ा और आगे रख लेता और पीछे के दोनों पैरों को भी थोड़ा आगे आने देता. इस प्रकार हर बार दस-बारह इंच सरक जाता-पर मुझे पता भी नहीं चलता. पर हाँ मैंने उसकी गर्दन कस कर पकड़ रखी थी-जैसे स्कूटर में पीछे बैठ कर मैं अपने पापा की कमर को पकड लिया करता था.
काफी देर बाद हम नदी के किनारे पहुँच चुके थे. पहाड़ों में नदियाँ बहुत शोर मचाती हुई बहती हैं. यह नदी पतली थी, पर इसकी धारा में वेग बहुत था और इसकी लहरें जब पत्थरों से टकराती तो बहुत आवाज करतीं. मैंने इस स्थान को पहले कभी देखा ही नहीं था. वहाँ जाने को नाना जी मना किया करते थे. कहते थे वहाँ मुर्दाघाट है. ये तो ज्ञात नहीं था कि मुर्दाघाट क्या होता है, पर दोस्त लोग बताते थे कि वहाँ भूत रहता है. डर के मारे थर, थर काँप रहा था मैं. पर अजीब पसोपेश में था-एक ओर मेरे पक्के दोस्त के ऊपर मेरा विश्वास था और दूसरी ओर नाना जी की डाँट तथा मुर्दाघाट के भूत का भय. नानी कहती थी कि ‘जब भी डर लगे तो आँखें बंद कर मन में भगवान का नाम लो.’ टुकटुक की गर्दन से लिपटा आँखे भींचे वही कर रहा था मैं.
अचानक पानी की आवाज गायब सी हो गयी. आँखे खोली तो पहले समझ में ही नहीं आया, ‘ये कहाँ ले आया टुकटुक!’ अंधेरी सुरंग सी थी. नीचे थोड़ा पानी भी था. शायद कोई बड़ी सी गुफा थी! एक जगह पानी कुछ रुका हुआ था और वहाँ पर एक छोटा सा ताल बन गया था. टुकटुक ने अपने पिछले पैर मोड़ कर मुझे उतरने को इशारा किया. फिर पानी में अपनी नाक डाल कर कुछ ढूँढने लगा. मैं समझा वह पानी पी रहा है.
और तभी टुकटुक की नाक पर उछल कर बैठ गया एक छोटा सा मेंढक. अपनी नाक आगे बढ़ा कर मेंढक से टुकटुक ने मेरी मुलाक़ात करवा दी. उसका नाम क्या था मालूम नहीं, पर मैंने उसका नाम उसी समय रख दिया टरटर. मैंने देखा वह मेरी ओर बड़े गौर से देख रहा है. जैसे हम दोस्त आपस में पहली बार मिलते हैं और ‘हाई’ कह कर पक्के दोस्त बन जाते हैं, कुछ वैसे ही नन्हे से टरटर ने टुकटुक की नाक से छलांग लगा दी और मेरे कोट के कॉलर पर आ बैठा. पहले तो मैं बहुत डरा. मैंने कभी मेंढक को इतने निकट से देखा ही नहीं था. पर जब उसको गौर से देखा और उसने अपनी पतली सी जीभ बाहर फेक कर मानों मुझे ‘हाई’ कहा! अरे ये क्या, टरटर ने अपनी एक आँख बंद कर मुझे आँख भी मारी. मैं मन ही मन सोच रहा था ‘ये तो बड़ा शैतान मेढक लगता है!’
टुकटुक ने मुझे एक बार फिर अपनी पीठ पर बैठने का इशारा किया. हम लोग बाहर निकले, इस बार हम दो नहीं बल्कि तीन दोस्त थे. बाहर नदी के किनारे कुछ लड़के खेल रहे थे. मुझे मालूम नहीं था कि चुपचाप सरक कर टरटर मेरी कमीज की जेब में बैठ चुका था. लड़के आपस में बात कर रहे थे, ‘अरे देखो कैसा काला घोड़ा, अकेले जा रहा है!’ मेरी समझ में नहीं आया कि ये मुझे क्यों नहीं देख पा रहे हैं. जैसे ही वह नजदीक आये टुकटुक ने दुलत्ती झाड़ी और हिनहिनाते हुए भागा. उसकी तेज चाल से मैं डरा कि कहीं टरटर गिर ना जाए. तब देखा कि वह हजरत तो मेरी जेब में आराम से बैठे हैं. लड़के दौड कर हमारा पीछा कर रहे थे. मैंने डरते हुए टरटर को दो उँगलियों से पकड़ कर निकाला. छी कितना लिजलिजा सा, गीला-गीला सा था वो. घिन अवश्य आ रही थी, पर क्या कर सकता था! तभी पीछे से आवाज आई, ‘अरे काले घोड़े पर वह लड़का कहाँ से आ गया?’ लगता था उन्होंने मुझे देख लिया था अब. तब तक सर्र से मेरे बगल से एक पत्थर निकल गया. लड़के पत्थर मार रहे थे. टुकटुक ने सारी बात समझते हुए अपनी चाल तेज करदी. कहीं गिर ना जाए इसलिए  मैंने टरटर को आहिस्ता से पकड़ कर फिर जेब में रखा ही था, कि पीछे से आवाज आई, ‘अरे, लड़का कहाँ गायब हो गया?’
मेरी समझ में अब यह ‘मिस्ट्री’ आ चुकी थी. टरटर जेब में रखते ही मैं ‘मिस्टर इंडिया’ की भाँती गायब हो जाता था! दूसरी बात यह समझ में आई कि मुझे इतनी दूर गुफा में टुकटुक सिर्फ इसलिए लाया ताकि वह मुझे टरटर से मिलवा दे और उसे अपने साथ ले जाने दे.
मेरा दिमाग तेजी से घूम रहा था. मैं सोच रहा था यदि यह सच हुआ तो मेरे तो स्कूल में मजे ही मजे हैं. मैथ्स टीचर की मार से भी बच ही जाऊंगा! टरटर को अपने साथ रख और क्या, क्या कर सकता हूँ आदि बातें मैं सोचने लगा. टरटर को कमीज की जेब से निकाल कर कोट की जेब में रख कर मैं टुकटुक से कस कर लिपट गया और घर पहुँचने तक वैसा ही लिपटे रहा. मेरी तंद्रा तब भंग हुई जब टुकटुक फुर्ती से मुझे लिए हुए अपने अस्तबल में घुस गया और आराम से ऐसे घास चरने लगा, जैसे वह कहीं गया ही न हो!
टरटर के साथ मैंने क्या क्या मजे किये पढ़ने के लिए प्रतीक्षा कीजिए. दूसरे दिन टुकटुक ने एक और दोस्त से दोस्ती करवा दी-वह तो बहुत ही मजेदार निकली. बस धीरज रखिये सारी कहानी आपके सामने आ जाएगी आने वाले दिनों में. तब तक के लिए बाय.

   

Sunday, January 5, 2014

परों वाला घोड़ा

बेतुकी कहानियाँ

परों वाला घोड़ा

बहुधा लेखक कहते हैं, 'यह कथा सच्ची घटनाओं पर आधारित है.' मैं केवल यह कहना चाहता हूँ कि इस ब्लॉग की बच्चों के लिए लिखी गयी समस्त कथाएँ निराधारित हैं. यह कथाएँ बालमन की बेतुकी उड़ाने हैं.

मेरे नाना जी के पास एक काले रंग का घोड़ा हुआ करता था-टुकटुक. ऊंचे कद के, घने अयाल वाले, 'टुकटुक' के माथे पर एक सफेद टीका था. उस टीके पर अकसर नाना जी का सईस, झपसट लाल रंग का तिलक लगा दिया करता था. नाना जी को टूर पर जाते, आते सरपट चाल से टुकटुक की पीठ पर बैठे देख कर मुझे भी बड़ा मन करता कि मैं भी उस पर सवारी करूँ. उस दिन जब नाना जी ने स्वयं मुझे अपने साथ बैठा कर टुकटुक की सवारी करवाई तो आनंद ही आ गया. अब जब भी मौक़ा मिलता मैं झपसट के साथ टुकटुक की पीठ पर बैठ कर पहाड़ी ढलानों पर सरपट दौड़ का आनंद लेने से नहीं चूकता था.
एक दिन की बात है, सांझ होने में थोड़ी देर थी, नाना जी सो रहे थे और मैं चुपके से सईस के साथ घूमने निकला था. टुकटुक, दुलकी चाल से पहाड़ की चढ़ाई चढ़ रहा था. मार्ग में एक दूकान मिली. मुझे रास थमाते हुए, झपसट ने टुकटुक को किनारे खड़ा किया और स्वयं उतर कर चला गया कुछ लेने. जैसे ही वह गया, टुकटुक ने पीछे मुड़ कर मुझे देखा और गर्दन हिलाकर मानों पूछा, 'चलें?' मुझे कुछ समझ में नहीं आया पर मैंने भी उसकी बात मानते हुए गर्दन हिलाकर 'हाँ' कर दिया. बस हाँ करने की देरी थी कि टुकटुक भाग चला तेजी से. मैं उससे कस कर लिपट गया. टुकटुक ने सड़क के मोड़ से सीधे घाटी की ओर छलांग लगा दी. मुझे क्षण भर को लगा कि अब तो हम दोनों खड्ड में गिर कर समाप्त हो जायेंगे! मैं कस कर उससे लिपट गया.
पर यह क्या, टुकटुक तो हवा में उड़ने लगा. कुछ देर बाद मैंने देखा कि हम लोग बहुत ऊपर आकाश में चिड़ियों के साथ उड़ रहे हैं. नीचे बहुत नीचे मुझे छोटे छोटे माचिस के डिब्बों से भी छोटे घर दिखने लगे-बहुत गौर से देखा तो वो मेरे गाँव के घर थे.
टुकटुक शायद मेरे मन की बात भांप गया, अपने पैरों को थोड़ा सिकोड़ते हुए कुछ नीचे आ गया. इस ऊंचाई से वो प्रधान जी का लाल छत वाला घर सबसे पहले पहचान में आया. फिर दिखा अपना स्कूल. मैंने देखा स्कूल के कच्चे रास्ते पर मनटन मास्साब एक हाथ में बेंत लिए और दूसरे में किताबें चले जा रहे थे. मास्साब को बच्चे और पशु दोनों नापसंद थे. दोनों की बेंत से पिटाई करते. एक दिन बाजार में टुकटुक उनको छूटा हुआ निकल गया. नाना जी ने झपसट को कहा कि टुकटुक को फलां दूकान के सामने ले आना. भीड़ थी, टुकटुक उस भीड़ से निकलते समय उनको छू गया. बस उन्होंने आव देखा ना ताव, अपने बेंत से दो लगाए कास कर उसे. वो तो बेचारा शरीफ घोड़ा था, कोई शैतान होता तो दुल्लती झाड़ देता वहीं. उस दिन, टुकटुक ने भी लगता था उनको ऊपर से ही पहचान लिया था. उसने अपने चारों पैर ऐसे फैला दिए मानों किसी बड़े पक्षी के पंख हों, और जोर से हिनहिनाते हुए, पूंछ उठा कर नीचे चल रहे मनटन मास्साब के ऊपर 'पौटी' कर दी. जैसे ही मास्साब ने अपनी गंजी खोपड़ी में कुछ महसूस किया-हम दोनों को ऊपर से ही अनुमान लग गया. उनकी हालत को सोच कर मुझे जोर की हंसी आ गयी, टुकटुक ने भी हिनहिना कर अपनी प्रसन्नता व्यक्त कर दी!.
जब तक मास्साब ऊपर देख कर पहचान पाते कि 'ये कौन सा पक्षी है जो घोड़े की तरह लीद कर रहा है', तब तक टुकटुक आँखों से ओझल हो चुका था.
झपसट को थी अफीम खाने की बीमारी. अफीम क्या होती है यह तो मैं नहीं जानता था, पर जब भी घूमने जाते तो वह टुकटुक को उसी रस्ते ले जाता और उसे पेड़ की डाल से बाँध कर घुस जाता दूकान के अंदर. लौट कर वह कुछ देर खूब प्रसन्न रहता पर उसके बाद टुकटुक को बहुत मारता था. मेरी और टुकटुक की दोस्ती हो चुकी थी. मुझको उसका टुकटुक को मारना बिलकुल पसंद नहीं था. हमारी दोस्ती गहराती गई और अब हम एक दूसरे की बात भी समझ लेते थे. जैसे ही वह टुकटुक को बांध कर दूकान में जाता, मैं रास को खोल देता. और टुकटुक मुझे लेकर दूर-दूर तक हवा में सैर कराता. टुकटुक की हवा में उड़ने वाली बात 'सीक्रेट' थी, जिसे केवल मैं ही जानता था. नाना जी को भी नहीं मालूम था. हम दोनों को कुछ देर तक ढूंढ कर फिर झपसट घर लौट आता. पर तब तक अफीम के नशे में उसे होश नहीं रहता और वह सो जाता. हम दोनों उसकी लत का भरपूर लाभ उठाते और नित्य नई जगहों की सैर किया करते.
अगली बार बताऊंगा टुकटुक की और सीक्रेट बातें-तब तक के लिए बाय...