मैथ्स सर की तो हो गई छुट्टी
कहाँ तो स्कूल के नाम से ही पेट में दर्द होने लगता था और कहाँ आज की
घटना के बाद से स्कूल जाने की इतनी व्यग्रता हो रही थी कि रात नींद तो मानों आँखों
से कोसों दूर भाग गई थी. बस हर समय यही लग रहा था कि कब सुबह हो और कब स्कूल जाऊं.
स्कूल जा कर देखना था ना कि मैथ्स सर का क्या हाल हुआ होगा! उनका फूलगोभी की भाँती
फूला हुआ चेहरा देखने की इच्छा बलवती होती जा रही थी. जब सुबह का इंतजार अधिक होता
है तब रात भी अधिक लंबी हो जाती है. अनेक बार ऐसा लगा कि सुबह हो गयी. रात भर
यही उठापटक चलती रही और ना जाने कब गहरी नींद आ गई. सपने में देख रहा था की मैथ्स
सर मुझे दोनों कन्धों से पकड कर झकझोर रहे हैं, साथ ही किसी के जोर जोर से पुकारने
की आवाज भी सुनाई दे रही थी. नींद खुली तो देखा, ममी हिला-हिला कर उठा रही थीं और
कह रही थें ‘आज स्कूल नहीं जाना है क्या?’
खैर किसी जल्दी-जल्दी तैयार हुआ, नाश्ता भी फुल स्पीड में खाया और
उससे भी तेज साईकिल चला कर पहुँच गया स्कूल. उस दिन टर्रटर्र को तो ले गया था, पर
रानी को घर पर ही छोड़ दिया-क्योंकि मुझे अनुमान था कि मैथ्स सर इतनी जल्दी ठीक
होने वाले नहीं और यदि हो भी गए होंगे तो भी शायद बच्चों की पिटाई न कर सकें!
क्लास में घुसते ही सभी बच्चे उत्सुक दिखे मैथ्स सर का हाल जानने के
लिए. केवल एक ही व्यक्ति ऐसा था जो सही हाल बता सकता था, उनका-वह था मंत्री पुत्र
मोटू. पर उससे पूछे कौन? हम सब (मैं और केनेथ तथा दो-तीन अन्य मित्र) तो उससे
बोलते तक नहीं थे. हमारी क्लास में मोटू की टक्कर का था लाला. जैसा नाम वैसा ही
स्वरूप था उसका. पिताजी उसके ठेकेदार थे-उसी विभाग के जिसके मोटू के पिता मंत्री
थे. मोटू और लाला में छनती भी बहुत थी और वही एक ऐसा इंसान था पूरी क्लास में जो
मोटू की लात नहीं खाता था. हाँ यदा-कदा दोनों साथ बैठ कर खाना अवश्य खाते थे
इंटरवल में. इधर जब से स्कूल खुला था, लाला आ नहीं रहा था. आज भाग्य से वह दिख
गया. मोटू के मुकाबले लाला चतुर था. उसके दोस्त अनेक थे, वह किसी से मारपीट नहीं
करता था और ना ही पैसों की झूठी शान दिखाता था. लाला की अंगरेजी कुछ वैसी ही थी,
जैसी मेरी मैथ्स. सर ने एक दिन हम सबसे अनुवाद करने को कहा. लाला को वाक्य दिया
गया ‘सूर्य गर्म होता है.’ लाला ने इसका अनुवाद किया ‘द सन इज होंट.’ बेचारा सर के
लाख सिखाने पर भी किसी प्रकार हॉट ना कह पाया. हम लोग हँसते रहे. पर इंग्लिश सर और
मैथ्स सर में यही अंतर था, उनको लाला पर गुस्सा नहीं आया, बल्कि उसे प्यार से
समझाते रहे.
खैर मैंने केनेथ से कहा कि लाला से के द्वारा मोटू से पता करो मैथ्स
सर कैसे हैं. थोड़ी देर के बाद लाला ने बताया कि मोटू कहा रहा है, ‘क्लास में खुद
ही देख लेना कैसे हैं सर.’ अब तो बड़ा टेंशन हो गया दिमाग में. मैं सोचने लगा, ‘आज
तो बचाव के लिए रानी भी नहीं है.’ फिर सोचा कोई बात नहीं ‘यदि सर पिटाई करने ही
लगेंगे तो गायब हो जाऊंगा टर्रटर्र की मदद से.’ आज के इंटरवल के बीस मिनिट कुछ
ज्यादा ही लगे. और दिनों तो लगता था, अभी तो शुरू ही हुआ था और इतनी जल्दी समाप्त
भी हो गया! पर आज तो एक-एक पल भारी हो रहा था. एक ओर से मन कह रहा था कि आज का
इंटरवल समाप्त ही ना हो! पर घंटी की टनटनाहट ने तंद्रा भंग की और हम सब चले क्लास
की ओर. इंटरवल के बाद क्लास की ओर हम लोग ऐसे जाते थे जैसे कसाई के साथ बकरे जाते
हैं. जबकि इंटरवल शुरू होने या छुट्टी की घंटी पर ऐसे भागते थे जैसे अस्तबल की ओर
जाता घोड़ा.
क्लास में एक अजीब सा सन्नाटा था. पता नहीं था सर आएँगे कि नहीं. कुछ
मिनिट के बाद मोटू क्लास से बाहर चला गया. बहुधा वह जाता था, मैथ्स सर का रजिस्टर
आदि लाने. मेरे सीने में धक-धक इतनी तेज थी कि लगता था मानों तबला बज रहा हो अंदर!
जैसी तेजी से मोटू गया था, उसी तेजी से लौट आया, मगर खाली हाथ. बड़ी तसल्ली हुई-यह
देख कर कि आज सर ने मोटू को लिफ्ट नहीं दी. मगर ऐसा कुछ नहीं था. मैथ्स सर की जगह
पर पी. टी. सर आ गए और बोले कि तुम लोग अपने बस्ते क्लास में छोड़कर बाहर मैदान में
चलो. आज मैथ्स सर नहीं आयेंगे. बहुत कोशिश करने के बावजूद अधिकाँश बच्चों के मुंह
पर मुस्कराहट आ ही गयी. बाहर मैदान में सर ने कुछ देर पी. टी. कराई और फिर हम
लोगों को एक पेड़ की छाया में बैठा दिया. स्वयं चले गए स्कूल की ओर. उनके मुड़ते ही,
सब बात करने लगे, ‘अबे, क्या हुआ होगा मैथ्स सर को?’ सब अपना अपना अनुमान लगा रहे
थे. तभी मोटू जोर से बोल उठा, ‘इसमें कोई खुशी की बात नहीं है, मैथ्स सर का मुंह
सूज कर कद्दू जैसा हो गया है और बहुत तकलीफ में हैं बेचारे. तुम लोग इस बात की
खुशी मना रहे हो, एक बार ठीक हो कर आने दो सबकी पिटाई करवाऊंगा.’ मोटू की धमकी से
हम लोग सहम से गए. पर फिर भी मन ही मन सभी प्रसन्न थे. सबसे अधिक प्रसन्न शायद मैं
था-क्योंकि सबसे अधिक पिटाई मेरी होती थी! छुट्टी की घंटी के पहले सर आए और
उन्होंने बताया कि फिलहाल एक हफ्ते तक मैथ्स सर नहीं आयेंगे. मेरा तो मन प्रसन्नता
से भरपूर था.
जब मैथ्स सर आते थे तब ऐसा लगता था कि जैसे मैथ्स का पीरियड चंद
मिनिटों में आ जाता था. पर प्रथम बार ऐसा हुआ कि मैथ्स टीचर छुट्टी पर थे और वह भी
एक हफ्ते की-अब तो मैथ्स पीरियड आते आते पूरा दिन बीत जाता था. खैर वह हफ्ता बड़ी
मस्ती में बीता. हम लोगों ने पी. टी. सर को पटा लिया और बजाय पी. टी. करने के उनसे
मैथ्स पढ़ने लगे. सच में वह इतनी अच्छी तरह से समझाते थे कि जो बातें इतने साल कभी
समझ में नहीं आई वह भी आसान लगने लगी. मैं सोचता था, ‘काश मैथ्स सर हमेशा के लिए
छुट्टी में रहते और पी. टी. सर मैथ्स पढ़ाते!’ पर हर अच्छी चीज अनिश्चित काल के लिए
नहीं होती.
उस सोमवार की सुबह जब मैं स्कूल के लिए तैयार हो रहा था तो मेरी बाईं
आँख बुरी तरह फड़क रही थी. मेरा मन आशंकित था कि आज कुछ ना कुछ गड़बड़ अवश्य होगी.
मैंने टर्रटर्र को बैग में रखा और चलते, चलते रानी को भी बालों में बैठा लिया. यह
स्वाभाविक था कि जब रानी चलेगी तो साथ में झुण्ड तो जाएगा ही. स्कूल पहुँचते ही,
मानों किसी अदृश्य इशारे रानी मेरे मन की बात समझ गई और सीधे अपने रोज वाले पेड़ पर
जा बैठी. मैं रोज की भाँती क्लास की ओर जा रहा था. मैने देखा सामने साइकिल पर
मैथ्स सर चले आ रहे हैं.
मैथ्स सर साइकिल पर
चले आ रहे थे.
उनका सामना ना हो, इसलिए मैं जल्दी से बरामदे में चढ़ गया और खंभे की
आड़ से मैंने देखा कि मैथ्स सर तो एक हफ्ते में और तंदरुस्त लग रहे थे. मैंने मन
में सोचा, ‘बेटा बिज्जी आज तो तू गया...’
कमाल यह हुआ कि उस दिन सारी कक्षाएँ ऐसा लगा कि फटाफट हो गईं, और तो
और इंटरवल भी कुछ छोटा ही प्रतीत हुआ. क्लास में घुसने के पूर्व मैं ‘वाशरूम’ गया
था, पर ना जाने क्यों मुझे लग रहा था कि सर के आने के पहले मैं एक बार और हो लूँ.
मेरा मन इसी उहापोह में था कि सर आ गये. मैथ्स सर ना तो कोई फ़ालतू बात करते थे और
ना ही उनसे कोई बोलता था. आते ही सबसे पहले हमेशा की तरह उन्होंने मुझे बुलाया और
एक कागज दिया, जिसमे दो सवाल लिखे हुए थे. हमेशा की तरह उन्होंने मुझसे कहा कि
‘इनको बोर्ड पर लिखो और हल करो.’ भाग्यवश इस प्रकार के भाग के प्रश्न दो दिन पहले
ही पी. टी. सर ने कराए थे. मेरा भाग्य अच्छा था कि मैं उनको बिना किसी दिक्कत के
कर ले गया. वापस सीट पर जाते हुए मुझे और दिनों की भाँती डर नहीं लग रहा था. मेरे
बाद और बच्चे बारी बारी से बोर्ड पर जाते रहे. फिर नंबर आया मोटू का. मोटू अपनी
सीट से उठा, पहले उसने जोर से जम्हाई लेते हुए अपने दोनों हाथों को ऊपर की ओर
खींचा, उसके बाद मस्त हाथी सा झूमता हुआ वह सर के निकट गया. सर ने एक पर्ची उसे
पकड़ा दी और बोले, ‘इस प्रश्न को बोर्ड पर हल करो.’ मोटू को सहसा विशवास नहीं हुआ.
साधारणतया वह उसे जो प्रश्न देते थे, उनका उत्तर भी उसी पर्ची में लिखा होता था-हम
लोगों को साफ़ दिखता था की मोटू पर्ची से सवाल और जवाब दोनों बोर्ड पर उतार देता
था. पर आज तो पर्ची में केवल प्रश्न ही लिखा हुआ था. मोटू ने एक बार पूछा, ‘सर इसे
हल भी करना है?’
सर ने गुर्राते हुए कहा, ‘हाँ, अभी हल करके सारे क्लास को दिखाओ.’
मोटू को तो यह भी समझ में नहीं आ रहा था कि प्रश्न में लिखा क्या है. लिखते हुए
बार-बार सर से पूछता. बहुत सोचा उसने, पर प्रश्न का उत्तर नहीं दे पाया. उस रोज
मोटू प्रश्न को हल नहीं कर सका. पता नहीं सर को क्या हुआ उस दिन! अचानक खड़े हुए और
जोर का एक जन्नाटेदार थप्पड़, मोटू की कनपटी पर दे मारा.
मैथ्स सर ने मारा
मोटू के थप्पड़
थप्पड़ पढ़ा नहीं कि मोटू चीखा पूरी ताकत से. उसकी चीख ऐसी थी जैसे कोई
राक्षस गरजा हो. चीखते हुए कह रहा था, ‘मास्टर तू तो गया, तुझे तो जेल होगी आज.’
कुछ प्रलय की सी स्थिति हो गयी. ना जाने कहाँ से मोटू का सुरक्षा गार्ड और ड्राइवर
दोनों लपक कर क्लास के अंदर आ गए और उसने सर को पकड़ लिया. पुलिस वालों की गिरफ्त
में आये सर वैसे ही गिड़गिड़ा रहे थे, जैसे मैं गिड़गिड़ाता था. वाह री किस्मत-हमारे
आगे शेर समान दहाड़ने वाले मैथ्स सर आज कैसे बकरे की भाँती मिमिया रहे थे, थरथरा
रहे थे. मेरे बालों में रानी के परों की कुछ फड़फड़ाहट हो रही थी. शायद रानी इस सब
शोरगुल, चीख, पुकार से परेशान थी! वह भी तो चुपचाप सारा तमाशा देख रही होगी! पुलिस
वाले लगभग घसीटते हुए मैथ्स सर को प्रिंसिपल साहेब के कमरे में ले गए. हम लोग
क्लास के दरवाजे पर खड़े उचक उचक कर देखने की चेष्ठा कर रहे थे, पर ना तो कुछ दिखा
रहा था और ना ही सुनाई दे रहा था. बस उस लाइन की सारी क्लास के टीचर और बच्चे
कौतुहल से उधर की ओर ही देखे जा रहे थे. काफी देर तक यह स्थिति बनी रही उसके बाद
ऑफिस से बड़े बाबू क्लास में आए और उन्होंने कहा ‘तुम लोगों की आज छुट्टी.’ जाते
समय बड़े बाबू अपने साथ वह मोटू को भी ले गए. सारा घटनाचक्र इतनी तेजी से घटा कि
मुझे लगा मैं स्वप्न देख रहा हूँ.
दूसरे दिन इंग्लिश टीचर ने बताया कि स्कूल की कमिटी ने मैथ्स सर को
नौकरी से निकाल दिया. सारे क्लास में क्या, सारे स्कूल में प्रसन्नता की लहर दौड़
रही थी. उनकी जगह अब मैथ्स की नई टीचर आ गयी थी. और हमारी खुशी तो सातवें आसमान
में थी. नई टीचर बिना सजा दिए बहुत अच्छी तरह पढाती थीं.
मेरे जीवन की एक बड़ी समस्या समाप्त हुई.
कुछ ही दिनों बाद दशहरे की छुट्टी होने वाली थी. तभी खबर आई कि नाना
जी कुछ अस्वस्थ हैं. छुट्टी आरंभ होने में तीन दिन बाकी थे कि हम लोगों का जाने का
प्रोग्राम बन गया. जैसे टर्रटर्र और रानी को को अपने साथ मैं लाया था, उसी प्रकार
उनको वापस भी ले गया.
नाना जी के घर पहुंचे तो वह तो थोड़ा ठीक हो चुके थे, कुर्सी पर बैठे
हुए थे. उन्होंने बताया कि झपसट अपने गाँव गया गया था तीन दिन के लिए और उसका वहाँ
एक्सीडेंट हो गया. जब से वह गया है टुकटुक खाना नहीं खा रहा है. मैंने जैसे ही
सुना मैं किसी से बात किए बिना सीधा भागा टुकटुक को देखने. जाते ही पहले तो मैंने
बालों से रानी को निकाल कर उड़ा दिया. अपना क्षेत्र वह भलीभांति जानती थी-और सीधे
चली गयी अपने झुण्ड के साथ. फिर टर्रटर्र को भी बाहर रख दिया और वह फुदक चला पास
ही एक पानी के सोते के पास. उसके बाद टुकटुक को मैंने खूब प्यार किया. मैंने देखा
उसकी आँख में आंसू थे. उसके आगे मैंने कुछ चारा रखा तो उसने उसे सूंघा और फिर मुंह
फेर लिया. मैंने बहुत मनाया उसे, पर लगता था वह कुछ भी खाने को तैयार नहीं था.
टुकटुक की आंख में आंसू थे.
मैं टुकटुक की खुशामद में लगा हुआ था, बाहर कोई आ गया, मुझे पता ही
नहीं चला. बाहर डॉक्टर साहेब आ चुके थे, टुकटुक को देखने. मुझे उन्होंने अस्तबल से
बाहर कर दिया. कुछ क्षण बाद टुकटुक के हिनहिनाने से लगा कि शायद उसे इंजेक्शन
लगाया गया था. डॉक्टर साहेब ने बताया कि टुकटुक बहुत बीमार है. उसे बहुत खराब
पीलिया है. मैं बहुत दुखी था सुनकर कि मेरा सबसे अच्छा दोस्त बीमार है. पर मैं कर
ही क्या सकता था!
सुबह मैं बहुत जल्दी उठ गया. उस समय सिर्फ नानी उठी हुई थी. मुझे देख
कर बोली, ‘बड़ी जल्दी उठा गया आज तू!’ मैंने कहा ‘हाँ मुझे टुकटुक से मिलना है.’
‘चल मैं भी चलती हूँ,’ नानी ने घुटनों पर जोर देकर उठते हुए कहा. और दिन जब मैं
टुकटुक के दरवाजे पर पहुंचता तो वह अंदर से हिनहिना कर मेरा स्वागत करता था. पर आज
कोई आवाज ही नहीं थी. मैंने बाहर से आवाज दी ‘टुकटुक’, पर कोई उत्तर नहीं आया.
मुझे लगा जैसे मैं मैथ्स टीचर की डर से स्कूल वाले दिन देर से उठता हूँ, शायद वैसे
ही डॉक्टर साहेब की डर से यह भी सो रहा है! मैने दरवाजे को धक्का देते हुए कहा,
‘टुकटुक डॉक्टर साहेब तो बहुत अच्छे होते हैं, डरता क्यों है!
नानी कहती थी, घोड़ा अगर जमीन पर बैठा हो तो इसका अर्थ है वह बीमार है.
अरे यह क्या, टुकटुक तो जमीन पर लेटा हुआ था. मुझे पीछे रोक कर नानी गयी उसके पास.
प्यार से आवाज दी उन्होंने, ‘टुकटुक बेटा उठो.’ कोई हरकत नहीं हुई. उन्होंने उसकी
नाक के आगे हाथ लगया देखने को कि सांस चला रही है या नहीं. प्यार से उसके शरीर पर
हाथ फेरते हुए नानी ने मुझसे कहा, ‘बेटा यह चला गया हम सबको छोड़कर.’ मुझे पूरी तरह
तो समझ में नहीं आया पर इतना अंदाज अवश्य आ चुका था कि मेरा बेस्ट फ्रेंड अब कभी
मुझे नहीं मिलेगा.
मेरा बेस्ट फ्रेंड हमेशा के लिए चला गया.




वाह !
ReplyDeleteधन्यवाद सुशील. तुम्हारी 'वाह' तो मुझे प्रेरित कर देती है और लिखने के लिए.
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